हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ हर वक्त बेहतर करने का दबाव हमें भीतर से खोखला कर रहा है। इसी दबाव से जन्म लेती है ‘इमोशनल ईटिंग’। यह वह स्थिति है जहाँ हम तनाव को सुलझाने के बजाय उसे खाने के नीचे दफन करने लगते हैं। जब खाने की प्लेट भूख मिटाने का जरिया न रहकर, इमोशनल सहारा बन जाए, तो यह सेहत के लिए खतरे की घंटी है।
क्या है यह ‘भावनात्मक भूख’?
आज की लाइफस्टाइल में हमारा खाना खाने का कारण बदल गया है। इसे ‘इमोशनल ईटिंग’ कहते हैं, जहाँ भूख शरीर को नहीं बल्कि मन को लगती है। हम तब नहीं खाते जब पेट खाली होता है, बल्कि तब खाते हैं जब हम परेशान या दुखी होते हैं। ऐसे में अक्सर हम मीठा या जंक फूड ही ढूंढते हैं क्योंकि वह हमें तुरंत अच्छा महसूस कराता है। लेकिन याद रखिए, यह सिर्फ भावनाओं को शांत करने का एक अस्थायी तरीका है, भूख मिटाने का नहीं।
कैसे पहचानें: असली भूख vs इमोशनल भूख
अक्सर हम शारीरिक भूख और जज्बाती जरूरत के बीच की धुंधली रेखा को पहचान नहीं पाते। ऑफिस का तनाव, रिश्तों की कड़वाहट या रातों की अधूरी नींद—ये सब हमें खाने में सुकून तलाशने पर मजबूर कर देते हैं। कभी अपनों से मिली निराशा तो कभी खुद के लिए वक्त की कमी, हमें स्वाद की शरण में ले जाती है। हद तो यह है कि यह सिलसिला सिर्फ गम में ही नहीं, बल्कि बेहिसाब खुशी में भी चलता है। धीरे-धीरे यह एक ऐसी लत बन जाती है, जहाँ पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि मन का खालीपन भरने के लिए खाया जाता है।
इमोशनल ईटिंग है खतरनाक
सोशल मीडिया की स्क्रॉलिंग वाला अकेलापन और ऑफिस की डेडलाइन्स का तनाव—जब ये अनकही बातें हमारे मन पर भारी होने लगती हैं, तो हम अक्सर सुकून की तलाश खाने की प्लेट में करने लगते हैं। शब्दों की जगह स्वाद से मन को भरने की यही कोशिश इमोशनल ईटिंग कहलाती है।
सेहत के लिए हानिकारक
अगर आप भावनाओं में बहकर खाने के आदी हैं, तो सावधान रहें। यह न केवल आपके शरीर को बीमारियों का घर बनाती है, बल्कि आपके मानसिक सुकून को भी छीन लेती है।





