शिक्षा की अलख और छात्र राजनीति का प्रखर चेहरा—डॉ. मदन मोहन शर्मा
सियासी सूरमा
छात्र राजनीति की तपिश से निखरे शिक्षाविद् डॉ. मदन मोहन शर्मा की अनकही कहानी
- शिक्षा, समाज और संघर्ष का त्रिकोण: डॉ. मदन मोहन शर्मा के अटूट जनसेवा के दो दशक
- विश्वविद्यालय के आंदोलनों से श्री बांके बिहारी सोसाइटी तक: एक सूरमा का वैचारिक सफर
ताजनगरी की सरजमीं ने हमेशा से ऐसे योद्धा पैदा किए हैं जिन्होंने राजनीति को सत्ता का जरिया नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम माना। इसी कडी में एक महत्वपूर्ण नाम है डॉ. मदन मोहन शर्मा का। एक पूर्व छात्र नेता, समर्पित समाजसेवी और दूरदर्शी शिक्षाविद् के रूप में डॉ. शर्मा ने पिछले कई दशकों से आगरा जनपद में शिक्षा और सामाजिक न्याय की जो मशाल थामी है, वह आज के युवाओं के लिए एक मार्गदर्शिका है।
छात्र राजनीति से जनसेवा का उदय
डॉ. मदन मोहन शर्मा के सार्वजनिक जीवन की नींव विश्वविद्यालय के उन गलियारों में पडी, जहाँ उन्होंने छात्र हितों के लिए लडना सीखा। एक छात्र नेता के रूप में उन्होंने न केवल विद्यार्थियों की समस्याओं को आवाज दी, बल्कि यह भी साबित किया कि युवा शक्ति यदि सही दिशा में चले, तो वह समाज में बडा परिवर्तन ला सकती है। छात्र जीवन से शुरू हुआ यह संघर्ष समय के साथ और भी परिपक्व होता गया और उन्होंने युवाओं, अभिभावकों और समाज के वंचित वर्गों की लडाई को अपना जीवन ध्येय बना लिया।
शिक्षा के क्षेत्र में क्रंतिकारी प्रयास
डॉ. शर्मा का मानना है कि शिक्षा ही वह एकमात्र चाबी है जो गरीबी और पिछडेपन के ताले खोल सकती है। वर्तमान में वे श्री बांके बिहारी एजुकेशनल सोसाइटी के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब और जरूरतमंद विद्यार्थियों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोडना हो या फीस वृद्धि और शिक्षा में पारदर्शिता के खिलाफ अभिभावकों को जागरूक करना—डॉ. शर्मा हर मोर्चे पर चट्टान की तरह खडे नजर आते हैं। उनकी संस्था आज गरीब मेधावियों के लिए एक बडा संबल बन चुकी है।
पारदर्शिता और सामाजिक समरसता के पक्षधर
महज राजनीति करना डॉ. शर्मा का स्वभाव नहीं है; वे वैचारिक स्पष्टता के धनी हैं। उन्होंने हमेशा शिक्षा व्यवस्था में सुधार, अभिभावकों के अधिकारों की रक्षा और ग्रामीण विकास के मुद्दों पर अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है। सामाजिक समरसता के प्रति उनका झुकाव उन्हें आगरा के प्रबुद्ध वर्ग और आम जनता के बीच समान रूप से लोकप्रिय बनाता है। वे एक ऐसे कार्यकर्ता हैं जो एयर-कंडीशंड कमरों के बजाय गांव की धूल और शहर की गलियों में जनसंवाद करना पसंद करते हैं।