अगर यह मेरे सामने रहा, तो..."जब PM मोदी की एक जिद के आगे रात 2 बजे बदलना पड़ा लाल किले का सुरक्षा घेरा!
बात उस रात की है जब पूरा देश 15 अगस्त 2014 की आधी रात के सन्नाटे में सो रहा था, लेकिन राजधानी दिल्ली स्थित लाल किले की प्राचीर पर सुरक्षा एजेंसियों के बीच हड़कंप मचा हुआ था। अगले दिन देश के नए-नवेले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने कार्यकाल का पहला स्वतंत्रता दिवस संबोधन देना था। सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया जा चुका था और मंच पर परंपरा के मुताबिक एक मजबूत बुलेटप्रूफ ग्लास बैरियर लगा दिया गया था।

चांदनी चौक की ऊंची इमारतों से किसी भी अप्रत्याशित खतरे को देखते हुए इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) और सुरक्षा अधिकारियों के लिए यह बुलेटप्रूफ शीशा एक अनिवार्य कवच था। तत्कालीन रक्षा सचिव आर.के. माथुर और IB निदेशक जब प्रधानमंत्री मोदी को सुरक्षा प्रोटोकॉल की जानकारी देने पहुंचे, तब उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि आगे क्या होने वाला है।
जैसे ही अधिकारियों ने सामने लगे बुलेटप्रूफ शीशे का जिक्र किया, प्रधानमंत्री मोदी ने उसे तुरंत हटाने का निर्देश दे दिया। सुरक्षा अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। आर.के. माथुर ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि सामने चांदनी चौक की घनी इमारतें हैं और सुरक्षा के लिहाज से इस शीशे का होना बेहद जरूरी है। लेकिन पीएम मोदी अपने निर्णय पर अडिग थे। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, "अगर यह मेरे सामने रहेगा, तो मैं अपने नागरिकों से सीधे तौर पर संवाद नहीं कर पाऊंगा।"
अधिकारियों की सलाह और प्रधानमंत्री की जिद के बीच लंबा तनाव चला। आखिरकार, सुरक्षा एजेंसियों को प्रधानमंत्री की इच्छा के आगे झुकना ही पड़ा। 15 अगस्त की तड़के करीब 2 बजे, जब पूरी दिल्ली नींद में थी, सुरक्षा बल लाल किले के मंच से उस बुलेटप्रूफ शीशे को उखाड़ रहे थे। अगली सुबह देश ने देखा कि प्रधानमंत्री बिना किसी कांच के घेरे के सीधे जनता से रूबरू हो रहे थे।
हाल ही में 80 वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान पूर्व रक्षा सचिव आर.के. माथुर ने इस अनसुने किस्से को साझा किया। दिलचस्प बात यह है कि इस वर्ष भी लाल किले पर भाषण समाप्त करने के बाद पीएम मोदी सुरक्षा घेरा दरकिनार कर स्कूली बच्चों, एनसीसी कैडेट्स और 'मेरा भारत' के स्वयंसेवकों के बीच खुद पहुँच गए।