"हर हाथ को काम : अब काम की नई संस्कृति चाहिए"
भारत में बेरोजगारी की चर्चा अक्सर नौकरी की संख्या तक सीमित रह जाती है। लेकिन असली सवाल इससे बड़ा है—क्या देश के हर सक्षम व्यक्ति को उसकी योग्यता और हुनर के अनुसार काम का अवसर मिल रहा है? करोड़ों युवा हाथ यदि काम से जुड़ जाएँ, तो यही हाथ भारत की सबसे बड़ी विकास शक्ति बन सकते हैं। इसलिए अब समय केवल नौकरी खोजने का नहीं, बल्कि काम की नई संस्कृति और रोजगार की नई सोच विकसित करने का है।
हमारा लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए—हर हाथ को काम, हर मेहनत को सम्मान और हर काम की उचित कमाई।
काम केवल कमाई का साधन नहीं ÿ। काम व्यक्ति को आत्मसम्मान देता है, जिम्मेदारी का एहसास कराता है और उसे अपने जीवन को अपने दम पर आगे बढ़ाने की ताकत देता है। इसलिए जो व्यक्ति काम करने में सक्षम है, उसे लगातार मुफ्त सुविधा का लाभार्थी बनाए रखने के बजाय काम, हुनर और कमाई का अवसर देना अधिक स्थायी रास्ता है। हाँ, जो बुजुर्ग, बीमार या वास्तव में असहाय हैं, उनकी मदद करना समाज और सरकार की जिम्मेदारी है।
हमें काम की ऊँच-नीच की अपनी पुरानी सोच भी बदलनी होगी। किसान, मजदूर, ड्राइवर, सुरक्षा कर्मी, बिजली मिस्त्री, प्लंबर, बढ़ई, राजमिस्त्री, वेल्डर, मशीन चलाने वाला, दुकानदार और कारीगर—इनमें से कोई भी छोटा नहीं है। इनके बिना देश का रोजमर्रा का जीवन चल ही नहीं सकता। काम की पहचान उसके पद से नहीं, उसकी उपयोगिता और ईमानदारी से होनी चाहिए।
रोजगार बढ़ाने के लिए हमें काम के समय और काम की व्यवस्था पर भी नए सिरे से विचार करना होगा। जहाँ काम की प्रकृति इसकी अनुमति दे, वहाँ तीन पालियों के स्थान पर चार पालियों की व्यवस्था की जा सकती है। इसका उद्देश्य किसी एक व्यक्ति से अधिक काम लेना नहीं, बल्कि काम का समय अधिक लोगों में बाँटना होना चाहिए। इससे एक ही कार्यस्थल पर अधिक लोगों को रोजगार मिल सकता है और उत्पादन तथा सेवाएँ लंबे समय तक चल सकती हैं।
कुछ क्षेत्रों में छह घंटे की काम की पाली भी रोजगार बढ़ाने का एक विकल्प हो सकती है। लेकिन इसे हर क्षेत्र पर थोपना उचित नहीं होगा। अस्पताल, परिवहन, खेती, सुरक्षा, कारखाने और कार्यालयों की जरूरत अलग-अलग है। इसलिए काम का समय काम की प्रकृति, सुरक्षा, उचित मजदूरी और श्रमिकों के अधिकारों को ध्यान में रखकर तय होना चाहिए।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात हमें समझनी होगी—देश की तरक्की का मतलब लोगों को लगातार काम में लगाए रखना नहीं है। काम और आराम एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि साथी हैं। लगातार थका हुआ व्यक्ति न बेहतर काम कर सकता है और न लंबे समय तक स्वस्थ रह सकता है। इसलिए लक्ष्य अधिक घंटे काम कराना नहीं, बल्कि उचित समय में अच्छा और पूरा काम करना होना चाहिए।
काम के समय ईमानदारी और पूरी जिम्मेदारी हो तथा आराम के समय शरीर, मन और परिवार को पर्याप्त समय मिले। सप्ताह में कम से कम एक पूरा दिन आराम जरूरी है। काम की प्रकृति और व्यवस्था के अनुसार दो दिन का साप्ताहिक अवकाश भी रखा जा सकता है। ड्राइवर, सुरक्षा कर्मी, मशीनों पर काम करने वाले और शारीरिक श्रम करने वाले लोगों के लिए बीच-बीच में पर्याप्त विश्राम और भी जरूरी है।
इसलिए सही नीति का आधार होना चाहिए—न काम का जरूरत से ज्यादा बोझ और न काम से अनावश्यक दूरी। काम के समय काम और आराम के समय पूरा आराम। यही स्वस्थ काम की संस्कृति है।
छुट्टियों को लेकर भी संतुलन जरूरी है। आराम कर्मचारी का अधिकार है, लेकिन बिना जरूरत बार-बार काम रुकना भी उचित नहीं। जरूरी सामाजिक, राष्ट्रीय और धार्मिक अवसरों की छुट्टियाँ रहें, लेकिन ऐसी व्यवस्था बने कि उत्पादन, शिक्षा और जरूरी सेवाएँ अनावश्यक रूप से बाधित न हों। हमें छुट्टियाँ घटाने की नहीं, बल्कि काम और आराम के बीच सही संतुलन बनाने की बहस करनी चाहिए।
रोजगार का सबसे मजबूत रास्ता हुनर से होकर जाता है। आज एक तरफ काम की जरूरत है और दूसरी तरफ काम खोजने वाले लोग। समस्या कई बार दोनों के बीच सही जुड़ाव की होती है। ऐसी व्यवस्था विकसित होनी चाहिए जिससे यह पता चल सके कि किस व्यक्ति को कौन-सा काम आता है और किस क्षेत्र में किस तरह के लोगों की जरूरत है। बिजली का हुनर रखने वाले को बिजली का काम, वाहन चलाने वाले को परिवहन का काम और मशीन चलाने वाले को मशीन से जुड़ा काम मिले।
युवाओं को केवल डिग्री नहीं, काम का हुनर भी चाहिए। पढ़ाई के साथ बिजली, मशीन, कंप्यूटर, खेती, बागवानी, निर्माण, वाहन, खाद्य पदार्थ बनाने और दूसरे उपयोगी काम सिखाए जाएँ। इससे युवा केवल नौकरी तलाशने वाले नहीं, बल्कि काम करने और काम पैदा करने वाले बनेंगे।
गाँवों में रोजगार की बड़ी संभावनाएँ मौजूद हैं। खेती, पशुपालन, डेयरी, बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन और छोटे उद्योग ग्रामीण रोजगार को नई दिशा दे सकते हैं। गाँव में सम्मानजनक काम और उचित कमाई मिलेगी तो मजबूरी में शहरों की ओर पलायन कम होगा।
महिलाओं को भी रोजगार के अधिक अवसर देने होंगे। सुरक्षित कार्यस्थल, आने-जाने की सुविधा और उनकी जरूरत के अनुसार काम का समय उपलब्ध कराया जाना चाहिए। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ेगी तो परिवार और देश दोनों मजबूत होंगे।
लेकिन अच्छी काम की संस्कृति केवल कर्मचारी से नहीं बनती। काम देने वाले की भी जिम्मेदारी है कि उचित मजदूरी, सुरक्षित वातावरण, समय पर भुगतान, सम्मानजनक व्यवहार और जरूरी आराम उपलब्ध कराए। दूसरी ओर कर्मचारी की जिम्मेदारी है कि वह समय की कद्र करे, ईमानदारी से काम करे और अपनी जिम्मेदारी पूरी करे। काम देने वाले और काम करने वाले के बीच भरोसा ही मजबूत कार्य संस्कृति की नींव है।
भारत के सामने आज सबसे बड़ा अवसर उसकी युवा शक्ति है। यदि इस शक्ति को सही शिक्षा, सही हुनर और सही काम से जोड़ दिया जाए, तो करोड़ों हाथ देश पर बोझ नहीं, देश की ताकत बन सकते हैं।
अब समय है कि हम रोजगार को केवल सरकारी नौकरी के चश्मे से देखना बंद करें। हर काम को सम्मान, हर मेहनत को उचित मूल्य और हर सक्षम व्यक्ति को अवसर—यही नई दिशा होनी चाहिए।
भारत तब वास्तव में आत्मनिर्भर बनेगा जब उसका हर सक्षम नागरिक यह कह सके—“मेरे पास काम है, मेरे काम का सम्मान है और मेरी मेहनत से मेरे परिवार तथा देश का भविष्य बेहतर हो रहा है।”
काम माँगने वाला हर हाथ, काम करने वाला हाथ बने;
और काम करने वाला हर हाथ, भारत की ताकत बने।