सड़कों पर युवा, ताक पर भविष्य: राजनीतिक सुविधा की बलि चढ़ता लोकतंत्र

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राँची की सड़कों पर बहता पानी, हवा में घुलता आंसू गैस का धुआं और पुलिस की लाठियों से बेदम होते छात्र—यह दृश्य केवल झारखंड की राजधानी का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के उस जर्जर स्तंभ का प्रतीक है जहां युवाओं के सपने प्रशासनिक भ्रष्टाचार और राजनीतिक ढोंग की भेंट चढ़ रहे हैं। जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में धांधली के खिलाफ 17 दिनों से आंदोलनरत युवाओं पर जब राज्य पुलिस ने लाठीचार्ज किया, तो सवाल केवल एक परीक्षा का नहीं रहा, सवाल यह खड़ा हुआ कि आखिर हमारा राष्ट्र किस दोराहे पर आ खड़ा हुआ है? वर्षों की मेहनत, माता-पिता की गाड़ी कमाई का त्याग और एक सरकारी नौकरी की उम्मीद लेकर राजधानी पहुंचे छात्र, अगर सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं, तो यह व्यवस्था की पूर्ण विफलता का स्पष्ट प्रमाण है। पेपर लीक, चयन प्रक्रिया में धांधली और भ्रष्टाचार भारत की परीक्षा प्रणाली का स्थाई चरित्र बन चुके हैं। जब लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं संवाद का द्वार बंद कर देती हैं, तब युवाओं को सड़कों पर आना पड़ता है। लेकिन चिंताजनक बात यह है कि युवाओं के इस जायज आक्रोश को सुनने के बजाय प्रशासनिक मशीनरी लाठियों और आंसू गैस के गोलों से जवाब देती है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे त्रासद स्थिति राजनीतिक दलों का दोहरा रवैया है। जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र या नागरिक अपनी मांगों को लेकर बैठते हैं, तब केंद्र की सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी उसे व्यवस्था को अस्थिर करने की साजिश या अनुशासनहीनता करार देती है। लेकिन वही पार्टी झारखंड की सड़कों पर छात्रों के इस प्रदर्शन में अग्रणी भूमिका निभाती दिखती है, क्योंकि वहां गैर-भाजपा सरकार है। दूसरी ओर, जो दल दिल्ली में पुलिसिया कार्रवाई पर मानवाधिकारों का पाठ पढ़ाते हैं, वे झारखंड में अपनी सरकार के तहत होते लाठीचार्ज पर रहस्यमयी चुप्पी साध लेते हैं। यह इस बात का नग्न प्रमाण है कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए छात्रों का भविष्य प्राथमिकता नहीं है। युवा उनके लिए केवल एक वोट बैंक या किसी दूसरे दल को घेरने का राजनीतिक मोहरा मात्र हैं। सवाल यह भी उठता है कि इस पूरे परिदृश्य में देश का मुख्यधारा मीडिया कहां है? जब देश के भविष्य निर्माता सड़कों पर लहुलुहान हो रहे होते हैं, तब प्राइम-टाइम बहसों में गैर-जरूरी मुद्दों और प्रायोजित विवादों का शोर होता है। निष्पक्ष पत्रकारिता की रीढ़ इस कदर झुक चुकी है कि सत्ता से सवाल पूछने के बजाय मीडिया राजनीतिक घरानों के एजेंडे को हवा देने में व्यस्त है। वहीं, विपक्ष का रवैया भी केवल मौकापरस्ती तक सीमित रह गया है। मुद्दों का समाधान खोजना या छात्रों के लिए ठोस नीतिगत लड़ाई लड़ना किसी की प्राथमिक सूची में नहीं है। राजनीति अब सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि केवल इस बात पर चल रही है कि किस राज्य में किसकी सरकार है। यदि देश की ऊर्जा—उसका युवा—अविश्वास, निराशा और दमन के माहौल में जीने को मजबूर होगी, तो हम किस विकसित भारत की कल्पना कर रहे हैं? जब परीक्षाओं की पारदर्शिता की मांग करने पर लाठियां मिलें और विरोध प्रदर्शनों को राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखा जाए, तो समझ लेना चाहिए कि देश की राजनीति की नैतिकता चरमरा चुकी है। आज देश को एक ऐसे आत्ममंथन की जरूरत है जहां सत्ता और विपक्ष दोनों को यह याद दिलाया जाए कि लोकतंत्र में जनता और युवा सर्वोपरि हैं। अगर समय रहते राजनीति ने अपनी यह अवसरवादी मानसिकता नहीं बदली, तो सड़कों पर फैला यह जन-आक्रोश केवल सरकारों को ही नहीं, बल्कि व्यवस्था पर से युवाओं के विश्वास को भी हमेशा के लिए उखाड़ फेंकेगा।

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