वृक्षों के नीचे झूलों के साथ अब नहीं सुनने को मिलता ये गीत

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झूला तो पड़ गए अंबुआ की डाल पे जी...

सोशल मीडिया से कमजोर हुई भारतीय संस्कृति और संस्कारों की डोर

पवन शाक्य

आगरा। सावन महीना मेरा जिया जले री बहना...।अरी बहना, अंखियां हैं प्यासी-प्यासी, मनवा में पूरनमासी...। आया सावन, बड़ा मनभावन, रिमझिम की पड़े फुहार, राधा झूल रहीं कान्हा संग में...।ऐसे सुमधुर गीत अब शहरों तो क्या कहीं गांव में भी सुनने को नहीं मिलते। कहीं भी निकल जाइए, महिलाएं हों या पुरुष, या फिर युवक-युवतियां... हर कोई अपने-अपने मोबाइल फोनों में खोए नजर आएंगे। त्योहारों के नाम पर तो अजीब सा सन्नाटा ही नजर आएगा। जी हां, हम बात उन दिनों की करते हैं। जब आज की तरह हर किसी के हाथ में मोबाइल फोन नहीं होते थे। तब सावन के महीने में रिमझिम फुहार के बीच हर गांव और शहर में युवतियों और महिलाओं की टोलियां किसी पेड़ के नीचे झूलों पर सुमधुर सावन गीत मल्हार गाते मिल जाती थीं। उनकी हंसी-ठिठोली और झूलों पर तो मानो दांव ही लगा रही हों, ऐसे पींगे बढ़ाती थीं। झूलों वाले पेड़ के नीचे तब युवतियों और महिलाओं की जो मौज-मस्ती, उन्मुक्तता, उल्लास और स्वच्छता देखने को मिलती थी। संभवतः वो आज कहीं नहीं दिखाई देती।

सोशल मीडिया पर शार्ट वीडियो ने किया सब कबाड़ा

भारतीय संस्कृति और संस्कारों की डोर निश्चित रूप से इस भौंड़े सोशल मीडिया और उस पर दिखने वाले शार्ट वीडियो ने मसल डाली है। तब जो युवतियां और घर की बहूएं अपने परिवार की दादी, सास, जेठानी, देवरानी, ननद और भाभियों के साथ हंसी-ठिठोली कर अपने संस्कार और भारतीय संस्कृति का परिचय देती थीं। आज वही शार्ट वीडियो में भद्दापन, अशुद्धता और भौंडेपन का प्रदर्शन करती हैं। संस्कारों के नाम पर अब कोई घर में बड़ों की बात तक सुनना पसंद नहीं करता।

सभी को समझनी होगी अपनी जिम्मेदारी

बदलते जमाने के साथ घर और परिवार में ये जो माहौल बदला है ना... इसे कोई कितना भी खुलापन और आधुनिकता क्यों न माने, पर हम तो इसे संस्कार और संस्कृति का नाश ही कहेंगे। मौजूदा समय में ये जो अंतिम पीढ़ी है ना... यदि इसकी अभी भी न सुनी गई तो आने वाले समय में मैं समझता हूं कि भारतीय संस्कृति और संस्कार नाम की कोई चीज ही नहीं बचेगी। इस लिए क्या छोटे और क्या बड़े, सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। तभी भारतीय हिंदू त्योहारों की शोभा युग-युगांतर तक जीवित रह सकेगी।

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