यादों का संदूक: ट्रंक, कनस्तर और वह बिस्तरबंद वाला पुराना जमाना

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कभी घर सिर्फ ईंट और छत नहीं होते थे, वे यादों के जीवंत संग्रहालय होते थे। उन यादों की रखवाली करते थे—भारी-भरकम लोहे के ट्रंक और रसोई में खनखनाते टीन के कनस्तर। आज भी दिल की गहराइयों में वह पुराना ट्रंक चुपके से सांस लेता है। नीले या हरे रंग का वह भारी बक्सा, जिसके ऊपर सफेद पेंट से गर्व से लिखा होता था शर्मा परिवार, आगरा। उसकी जंग लगी कुंडियों और वह पुरानी विशिष्ट गंध… ढक्कन खोलते ही बचपन की पूरी गर्मियां बाहर निकल आती थीं।

संयुक्त परिवार की धडक़न: ट्रंक और संदूक
घर के बड़े संदूकों में कपूर की गोलियां नीम के पत्तों के साथ सोई रहती थीं। शादी-ब्याह के मौके पर जब वह ट्रंक जादू की तरह खुलता, तो उसमें से चादरें, गद्दे और रजाइयां निकलतीं और पूरा संयुक्त परिवार एक उत्सव में सज जाता। वह ट्रंक कभी पढऩे की मेज बन जाता, तो कभी रेडियो का सिंहासन। पुराने दौर के शिक्षक रघुनाथ प्रसाद यादों में खोकर कहते हैं, ट्रंक कोई निर्जीव वस्तु नहीं, बल्कि घर का वह चुपचाप खड़ा बुजुर्ग था, जो हर जरूरत में काम आता था।

सफर का रोमांच: होल्डॉल और सुराही
ट्रेन की छुट्टियों का वह नजारा अब स्वप्न जैसा लगता है। चमड़े की बेल्ट से कसकर बांधा हुआ बिस्तरबंद या होल्डॉल तैयार करना एक कला थी, जिसमें हर कोई माहिर नहीं होता था। स्टेशन पर कुली सिर पर ट्रंक और कंधे पर होल्डॉल रखे आगे चलता और पीछे पूरा परिवार एक जुलूस की तरह। सुशीला ताई याद करती हैं, जब ट्रेन में सीट नहीं मिलती थी, तो हम बच्चे उसी ट्रंक पर बैठकर खिडक़ी से उड़ते बादलों को गिना करते थे। साथ में मिट्टी की सुराही का वह मीठा पानी सफर की थकान मिटा देता था।

दादी की गुप्त तिजोरी: कनस्तर और इमरतबान
रसोई का सम्राट था—टीन का मोटा कनस्तर। वह चूहों से बचाव का अभेद्य किला था, जिसमें दादी लड्डू, मठरी और सेव छिपाकर रखती थीं। उनमें महीनों का राशन—गेहूं, आटा, गुड़—सांस लेता था। वहीं, इमरतबान में पकते आम और नींबू के अचार की खुशबू पूरे घर में महकती थी। साइकिल पर कनस्तर रखकर आटा चक्की तक जाना भी बच्चों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था।

बदलते दौर में सिमटते रिश्ते
आज अलमारी और पहियों वाले ट्रॉली बैग (स्शशह्लष्ड्डह्यद्ग) का दौर है। घर बड़े हो गए, लेकिन यादें रखने की जगह छोटी पड़ गई। आज के बच्चे होल्डॉल और बिस्तरबंद के नाम तक नहीं जानते। अब सब कुछ पैकेटों में आता है—न वह भंडारण बचा, न वह धैर्य। सच तो यह है कि उन ट्रंकों में सिर्फ कपड़े नहीं, बल्कि रिश्ते तह करके रखे जाते थे। कनस्तर में सिर्फ अनाज नहीं, घर की खुशहाली बंद होती थी। ट्रंक, कनस्तर और इमरतबान चले गए और अपने साथ वह पूरा जमाना ले गए, जो अब सिर्फ यादों के संदूक में धीरे-धीरे खनकता है।

  • लेखक: बृज खंडेलवाल, वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरणविद और चिंतक

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