यह उस समय की बात है जब छत्रपति शिवाजी महाराज अपने राज्य का विस्तार कर रहे थे और उनके पास अपार धन-संपदा और विशाल सेना थी। एक दिन शिवाजी के मन में यह विचार आया कि— मैं हजारों लोगों का भरण-पोषण कर रहा हूँ, मेरी सेना और प्रजा मेरे ही कारण सुरक्षित और सुखी है। शिवाजी के गुरु, समर्थ रामदास स्वामी, उनके मन के इस सूक्ष्म अहंकार को ताड़ गए।
गुरु की विचित्र लीला
एक दिन जब शिवाजी अपने गुरु के साथ कहीं जा रहे थे, तो मार्ग में एक बहुत बड़ा पत्थर पड़ा मिला। समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी से कहा, शिवा! इस पत्थर को तुड़वाओ, यह रास्ते में बाधा बन रहा है। शिवाजी ने तुरंत अपने सैनिकों को आदेश दिया और पत्थर के दो टुकड़े कर दिए गए।
पत्थर के भीतर का रहस्य
जैसे ही पत्थर टूटा, उसके भीतर एक छोटी सी गुहा (गड्ढा) निकली, जिसमें थोड़ा सा पानी भरा था और वहां एक छोटा सा मेंढक मजे से बैठा था। शिवाजी यह देखकर हैरान रह गए कि एक बंद पत्थर के भीतर, जहाँ न हवा थी न रोशनी, वहां वह मेंढक कैसे जीवित था? रामदास स्वामी मुस्कुराए और बोले, शिवा! अब बताओ, इस मेंढक को इस पत्थर के भीतर भोजन और पानी किसने पहुँचाया? क्या तुम इसके पालनहार हो? शिवाजी महाराज को अपनी भूल का अहसास हो गया। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे और वे गुरु के चरणों में गिर पड़े। उन्हें समझ आ गया कि इस जगत में कोई भी मनुष्य किसी का भाग्य विधाता नहीं है। हम सब केवल निमित्त (रूद्गस्रद्बह्वद्व) मात्र हैं। असली पालनहार तो वह ईश्वर है, जो पत्थर के भीतर छिपे जीव की भी चिंता करता है।
गूढ़ रहस्य और सीख:
इस कथा का गूढ़ रहस्य यह है कि जब हम सफलता के शिखर पर होते हैं, तो अक्सर कर्ता होने का भाव (कि मैं कर रहा हूँ) हमारे विवेक को ढंक लेता है। लेकिन सत्य यह है कि हम केवल एक माध्यम हैं।
TNF TODAY का विचार: पद और प्रतिष्ठा मिलने पर सेवा का भाव रहना चाहिए, न कि स्वामित्व का। जिस दिन मनुष्य मैं को छोडक़र हम और ईश्वर की इच्छा को स्वीकार कर लेता है, उसी दिन वह वास्तविक अर्थ में महान बनता है।





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