मौन हैं माननीय, लाचार है पुलिस: क्या आगरा में न्याय भी जाति देखकर होगा?

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महापुरुषों का चीरहरण: जातियों के बाड़े में कैद हुए परशुराम और बाबा साहेब!

जातियों के कुरुक्षेत्र में महापुरुषों का अपमान और पुलिसिया लाचारी

ताजनगरी की आबोहवा में इन दिनों समरसता की मिठास नहीं, बल्कि जातिगत विद्वेष की कड़वाहट घुली हुई है। आवास विकास सेक्टर-5 स्थित परशुराम चौक पर 14 अप्रैल को जो कुछ भी हुआ, वह केवल एक चौक का अपमान नहीं, बल्कि उस भारतीय मर्यादा का चीरहरण है जिसमें महापुरुषों को अधिष्ठाता माना जाता है, जाति का मोहरा नहीं। विडंबना देखिए, जिस संविधान ने हमें बराबरी का अधिकार दिया, उसी के रचयिता डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर कुछ अराजक तत्वों ने भगवान परशुराम के चौक पर जूते-चप्पल पहनकर हुड़दंग मचाया और नीले झंडे फहरा दिए।
आज का दौर वह है जहाँ हमने महापुरुषों को उनकी विचारधारा से नहीं, बल्कि उनकी जाति से तौलना शुरू कर दिया है। दलित समाज ने बाबा साहेब को अपना भगवान बना लिया और ब्राह्मण समाज ने भगवान परशुराम को अपनी विरासत तक सीमित कर दिया। सच तो यह है कि परशुराम केवल ब्राह्मणों के नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के आराध्य हैं और बाबा साहेब का संविधान केवल एक वर्ग के लिए नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की ढाल है। जब हम इन्हें जातियों के बाड़े में बंद करते हैं, तो हम उनके कद को छोटा कर देते हैं।
इस घटना का दूसरा पहलू और भी दिलचस्प है। आगरा में ब्राह्मण समाज भी बहुसंख्यक है। यहाँ ब्राह्मण नेता हैं, विधायक हैं, मंत्री हैं और बड़े-बड़े रसूखदार व्यापारी भी हैं। लेकिन जब परशुराम चौक के अपमान की बात आई, तो सडक़ों पर केवल कुछ मु_ी भर समाज के लोग ही क्यों नजर आए? क्या राजनैतिक रोटियां सेंकने वाले इन रसूखदारों के लिए भगवान परशुराम केवल चुनाव के समय वोट बैंक साधने का जरिया भर हैं? क्या सत्ता की मलाई चाटने वाले इन सफेदपोशों के हाथ में राजनैतिक चूडय़िाँ सज गई हैं जो वे इस अपमान पर मौन साधे बैठे हैं?
सबसे शर्मनाक भूमिका आगरा पुलिस की रही। पहले घटना को नकारना, फिर दबाव बढऩे पर 48 घंटे का चुनावी अल्टीमेटम देना—यह पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान है। जब सीसीटीवी फुटेज और सोशल मीडिया पर अराजक तत्वों की पोस्ट सरेआम तैर रही हैं, तो पुलिस का तंत्र लकवाग्रस्त क्यों है? क्या पुलिस किसी बड़े दंगे या आंदोलन का इंतजार कर रही है?
हद तो तब हो गई जब प्रदर्शनकारियों को समझाने के लिए पुलिस ने जातिगत कार्ड खेला और केवल ब्राह्मण-क्षत्रिय अधिकारियों को ही मौके पर भेजा। क्या खाकी भी अब जातियों में बंट गई है? अगर न्याय का पैमाना जाति तय करेगी, तो दोषियों के हौसले बुलंद होना लाजिमी है। त्वरित कार्रवाई न करके पुलिस ने खुद उन नेताओं को मौका दिया है जो समाज में नफरत की खेती करके अपनी राजनैतिक फसल काटना चाहते हैं।
समरसता और समानता के खोखले नारों के बीच आगरा का यह घटनाक्रम एक कड़वा सच बयां कर रहा है। अगर समय रहते अराजक तत्वों को सलाखों के पीछे नहीं भेजा गया और समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने चुप्पी नहीं तोड़ी, तो वह दिन दूर नहीं जब आगरा की गलियाँ जातिगत कुरुक्षेत्र बन जाएंगी। पुलिस को समझना होगा कि अल्टीमेटम अपराधियों को भागने का मौका देता है, न्याय को नहीं।

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