- यूनिवर्सिटी का डिजिटल फेलियर: दावों की रिफिलिंग और नकल की निर्बाध सप्लाई!
डिग्री की फैक्ट्री और नकल का उत्सव
- आगरा की शिक्षा का गिरता स्तर
आगरा। डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय की परीक्षाएं एक बार फिर शुरू हो चुकी हैं। लेकिन विडंबना देखिए, ताजनगरी में परीक्षा का अर्थ अब योग्यता का परीक्षण नहीं, बल्कि नकल का महोत्सव बन गया है। जिस विश्वविद्यालय का इतिहास कभी गौरवशाली रहा हो, आज वह डिजिटल युग में भी एक पारदर्शी और नकल-विहीन परीक्षा कराने में पूरी तरह विफल साबित हो रहा है।
सेल्फ सेंटर: नकल को मान्यता देने का नया खेल?
इस बार विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक और क्रांतिकारी कदम उठाया है—100 से अधिक छात्र वाले सेल्फ-फाइनेंस कॉलेजों को सेल्फ सेंटर (अपना ही कॉलेज, अपना ही केंद्र) की सुविधा दे दी गई है। यह निर्णय सुनने में तो छात्र-हितैषी लगता है, लेकिन धरातल पर यह नकल माफिया के लिए रेड कार्पेट बिछाने जैसा है। जब कॉलेज का प्रबंधन अपना हो, परीक्षक अपने हों और निगरानी करने वाली आंखें बंद हों, तो वहां योग्यता का गला घोंटना कितना आसान हो जाता है, यह किसी से छिपा नहीं है।
कॉलेज या केवल परीक्षा केंद्र का ढांचा?
आगरा के कोने-कोने में कुकुरमुत्तों की तरह डिग्री कॉलेज उग आए हैं। कुछ प्रतिष्ठित संस्थानों को छोड़ दें, तो अधिकांश कॉलेज केवल एक बिल्डिंग और एक बोर्ड बनकर रह गए हैं। यहां पूरे साल क्लास नहीं चलती, छात्र केवल एडमिशन लेने और डिग्री उठाने आते हैं। अभिभावक भी इस पाप में उतने ही भागीदार हैं, जो अपने बच्चों को मेहनत के बजाय जुगाड़ से पास कराने का रास्ता ढूंढते हैं। आखिर ऐसी ग्रेजुएशन और पोस्ट-ग्रेजुएशन की डिग्रियों का क्या मूल्य, जो रोजगार के बाजार में कागज के टुकड़ों से अधिक कुछ नहीं?
डिजिटल इंडिया में मैनुअल गड़बड़ी
हैरत की बात यह है कि आज जब दुनिया एआई और आधुनिक तकनीक की बात कर रही है, हमारी यूनिवर्सिटी एग्जामिनेशन सेंटर बनाने के नाम पर वसूली और गड़बड़ी के आरोपों से घिरी रहती है। सेंटर आवंटन में पारदर्शिता का अभाव और उडऩदस्तों का महज औपचारिकता बनकर रह जाना, विश्वविद्यालय की साख पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। क्या विश्वविद्यालय प्रशासन इतना लाचार है कि वह निजी कॉलेजों के रसूख के आगे घुटने टेक चुका है? शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का निर्माण करना है, न कि उसे डिग्रीधारी बेरोजगारों की फौज में शामिल करना। यदि विश्वविद्यालय ने अब भी नकल पर जीरो टॉलरेंस की नीति कड़ाई से लागू नहीं की और कॉलेजों में कक्षाओं की अनिवार्यता सुनिश्चित नहीं की, तो वह दिन दूर नहीं जब आगरा की डिग्री पर कोई संस्थान भरोसा करने को तैयार नहीं होगा। यह समय आत्ममंथन का है—विश्वविद्यालय के लिए भी, शिक्षकों के लिए भी और उन अभिभावकों के लिए भी जो अपने बच्चों के भविष्य की नींव ‘नकल’ की रेत पर रख रहे हैं।
खुफिया छापे और लीक होती शुचिता—आगरा विवि की साख का पोस्टमार्टम
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय की सेमेस्टर परीक्षाओं में इन दिनों जो लुका-छिपी का खेल चल रहा है, उसने शिक्षा व्यवस्था की जड़ों में लगी दीमक को पूरी तरह उजागर कर दिया है। विश्वविद्यालय द्वारा केंद्रों पर खुफिया फ्लाइंग स्क्वाइड भेजना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि प्रशासन को अपने ही नियुक्त किए गए सचल दल प्रभारियों पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। जब रक्षक ही भक्षक के साथ सूचना साझा करने लगें, तो परीक्षाओं की शुचिता का मरण तय है।
सामूहिक नकल का ओएमआर मॉडल
हालिया छापों में जो तथ्य सामने आए हैं, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। दो केंद्रों पर सामूहिक नकल के पुख्ता प्रमाण मिले हैं, जहाँ 50 से 60 छात्रों की ओएमआर शीट पर एक जैसे उत्तर पाए गए। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नकल सिंडिकेट का नतीजा है। डिजिटल युग में जब पेपर ओएमआर पर हो रहे हैं, तब भी नकल माफिया ने उसे हल करने का शॉर्टकट ढूंढ निकाला है। विडंबना देखिए, सचल दल के पहुँचने से पहले ही केंद्रों पर छापे की सूचना पहुँच जाती है। क्या यह संभव है कि बिना किसी अंदरूनी मुखबिरी के गोपनीय फ्लाइंग स्क्वाइड की लोकेशन लीक हो जाए?
स्वकेंद्र प्रणाली: गड़बड़ी की गारंटी
480 से अधिक कॉलेजों में स्वकेंद्र (स्द्गद्यद्घ-ष्टद्गठ्ठह्लद्गह्म्) प्रणाली लागू करना आग में घी डालने जैसा साबित हुआ है। अपने ही घर में बैठकर परीक्षा देने वाले छात्रों और कॉलेज प्रबंधकों के बीच जो गठजोड़ बना है, उसे तोडऩे के लिए अब विश्वविद्यालय को खुफिया एजेंसी की तरह काम करना पड़ रहा है। सचल दल प्रभारी को अंधेरे में रखकर भेजी गई फ्लाइंग स्क्वाड ने कॉलेजों में हडकंप तो मचा दिया, लेकिन यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि क्या पूरी व्यवस्था ही भ्रष्टाचार की चादर ओढें हुए है?
डिग्री की साख और छात्रों का भविष्य
अभिभावकों और छात्रों को यह समझना होगा कि नकल से मिली प्रथम श्रेणी की डिग्री केवल कागज का एक टुकडा है। आगरा के डिग्री कॉलेजों का नेक्सस छात्रों को काबिल बनाने के बजाय उन्हें अपाहिज बना रहा है। जब गाडियों के चालकों को मोबाइल रखने से रोका जा रहा हो ताकि सूचना लीक न हो, तो समझ लीजिए कि भरोसे का स्तर कितना गिर चुका है। क्या विश्वविद्यालय हर परीक्षा में इसी तरह छापामार युद्ध लडेगा या कभी एक पारदर्शी और पारलौकिक परीक्षा प्रणाली भी विकसित कर पाएगा?
परीक्षा नियंत्रक के औचक निरीक्षण और गोपनीय कार्रवाई की सराहना तो होनी चाहिए, लेकिन यह बीमारी का इलाज नहीं, महज पट्टी है। जब तक स्वकेंद्र प्रणाली खत्म नहीं होती और गडबडी करने वाले कॉलेजों की मान्यता स्थायी रूप से रद्द नहीं की जाती, तब तक आगरा की शिक्षा व्यवस्था में हडकंप तो मचेगा, लेकिन सुधार नहीं आएगा।






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