सही और ग़लत के बीच का वह अदृश्य कोहरा!
- लेकिन क्या ये ‘लगता है’ आपका अपना निष्कर्ष है, या समाज की बनी-बनाई धारणा का असर?
- सही और ग़लत का भ्रम: क्या आप अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं या समाज की धारणा?
- सच के साथ ईमानदारी: क्या हम समाज के सांचे में ढले हुए कठपुतली मात्र हैं?
रिमझिम वर्मा सचदेव।
हम ऐसे समाज में जीते हैं जहाँ सही और ग़लत के मानक पहले से तय कर दिए जाते हैं। बचपन से हमें बताया जाता है कि ऐसे चलो, ऐसे सोचो, ऐसे जीओ। धीरे-धीरे ये नियम हमारे भीतर इतने गहरे बैठ जाते हैं कि हम अपने हर फैसले को उसी तराज़ू पर तौलने लगते हैं। और जब हमारा मन उस तय रास्ते से थोड़ा भी भटकता है, तो सबसे पहले जन्म लेता है – Guilt। यह Gilt अक्सर किसी वास्तविक ग़लती से नहीं, बल्कि उस डर से पैदा होता है कि लोग क्या कहेंगे? मनोविज्ञान में इसे कहा जाता है। जहाँ व्यक्ति अपने असली विचारों से ज़्यादा समाज की अपेक्षाओं के अनुसार खुद को ढालने लगता है। परिणाम ये होता है कि इंसान बहुत कुछ हासिल कर लेने के बाद भी भीतर से अधूरा महसूस करता है, क्योंकि वो अपने बनाए रास्ते पर नहीं, बल्कि दिए गए रास्ते पर चल रहा होता है।
इतिहास: जब ग़लत होना ही क्रांति बना
इतिहास ऐसे लोगों से भरा पड़ा है जिन्हें पहले ग़लत कहा गया। जब गैलीलियो ने कहा कि पृथ्वी सूरज के चारों ओर घूमती है, तो उसे समाज और सत्ता दोनों ने नकार दिया। जब राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ आवाज़ उठाई, तो उन्हें परंपराओं के खिलाफ बताया गया।
यहाँ तक कि आज के दौर में भी, जब कोई व्यक्ति पारंपरिक करियर छोडक़र कुछ नया करता है। जैसे कला, लेखन, या किसी अलग सोच को अपनाता है तो शुरुआत में उसे भटका हुआ या ग़लत कहा जाता है। लेकिन वही व्यक्ति जब सफल हो जाता है, तो समाज उसकी कहानी को प्रेरणा की तरह सुनाता है।
सवाल ये है कि क्या वे लोग पहले ग़लत थे और बाद में सही हो गए? या फिर सही-ग़लत का पैमाना ही समय, परिस्थिति और लोगों के हिसाब से बदलता रहता है? असल में, ग़लत अक्सर वो होता है जो अलग होता है। और सही वो बन जाता है जिसे बहुमत स्वीकार कर लेता है।
खालीपन का समझौता
मनोविज्ञान ये भी बताता है कि इंसान को समूह में स्वीकार किए जाने की गहरी आवश्यकता होती है। इसे ठ्ठद्गद्गस्र द्घशह्म् ड्ढद्गद्यशठ्ठद्दद्बठ्ठद्दठ्ठद्गह्यह्य कहते हैं। यही कारण है कि हम कई बार अपनी सच्चाई को दबाकर भीड़ के अनुसार खुद को ढाल लेते हैं। लेकिन ये समझौता धीरे-धीरे भीतर एक खालीपन छोड़ देता है। एक ऐसा अहसास कि मैं जो हूँ, वो पूरी तरह जी नहीं पा रहा।
इसलिए जरूरी ये नहीं है कि आप समाज के हर मानक को तोड़ दें, बल्कि ये समझें कि हर मानक अंतिम सत्य नहीं होता। जो आज ग़लत दिख रहा है, वही कल एक नई शुरुआत भी हो सकता है।
शायद सवाल ये नहीं होना चाहिए क्या मैं ग़लत हूँ? बल्कि ये होना चाहिए क्या मैं अपने सच के साथ ईमानदार हूँ? क्योंकि आखऱि में ग़लत कुछ नहीं होता! सब कुछ बस अलग होता है।
और वही अलगपन समय आने पर, पहचान बन जाता है।






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