जूता कंपनी में मैनेजर बनना है या अखबार में रिपोर्टर?
"हमारे मीडिया समूह की एक जूता कंपनी भी है। वहां मैनेजर पद के लिए योग्य कैंडिडेट की आवश्यकता है। चयन होने पर उसे 10 हजार रुपये वेतन के अलावा बंगला और गाड़ी भी मिलेगी। तुमने अखबार में प्रशिक्षु रिपोर्टर पद के लिए आवेदन किया है, जहां सब मिला-जुलाकर तीन हजार रुपये मिलेंगे। अब तुम खुद तय करके बता लो... जूता कंपनी में मैनेजर बनना है या अखबार में रिपोर्टर?"
यह सवाल 1990-91 के दौर में मुझसे एक इंटरव्यू के दौरान पूछा गया था। भोपाल में शाम के एक टैबलॉयड के लिए रिपोर्टर/उपसंपादक पद की लिखित परीक्षा पास कर चुके अभ्यर्थियों का साक्षात्कार लिया जा रहा था। आज इतने वर्षों बाद जब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो समझ आता है कि उस समय के वरिष्ठ संपादकों की दूरदृष्टि कितनी तीक्ष्ण थी। आज मीडिया जगत में हूबहू यही हो रहा है ; आज की आम सोच यही बन चुकी है। कुछ वर्षों पहले एक बड़े अखबार के एक वरिष्ठ पत्रकार साथी ने अनौपचारिक बातचीत में यहां तक कह दिया था- "सेठ जी पैसा देते रहें, चाहे कुछ भी करवा लें। वे कहेंगे तो उनके गेट के बाहर भी खड़े हो जाएंगे।" इसी मानसिकता का एक और वाकया मुझे याद आता है, जहां एक अन्य संपादक महोदय अपने मालिक की भक्ति में इस कदर लीन थे कि हद न थी। एक बैठक के दौरान सेठ जी की नजर अपनी ही मेज पर रखे पानी के गिलास पर पड़ी। संपादक महोदय लपक कर खड़े हुए, गिलास उठाकर मालिक को दिया और तब तक मुस्तैद खड़े रहे जब तक कि खाली गिलास वापस लेकर उसे यथास्थान रख नहीं दिया। यह दृश्य सिर्फ एक गिलास उठाने का नहीं था, बल्कि रीढ़विहीन होती जा रही पत्रकारिता के समर्पण का प्रतीक था।
-अनाम