बेंगलुरु-मंगलुरु वंदे भारत: वेस्टर्न घाट की कठिन पहाड़ियों के बीच सफल ट्रायल और ऐतिहासिक उपलब्धि

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बेंगलुरु/मंगलुरु: भारतीय रेलवे ने इंजीनियरिंग का एक ऐसा नायाब मील का पत्थर हासिल किया है, जिसे देखकर दुनिया भर के विशेषज्ञ भी हैरान हैं। कर्नाटक के बेंगलुरु और मंगलुरु के बीच यात्रियों के सफर को आसान बनाने के लिए शुरू किया गया 'वंदे भारत' ट्रेन प्रोजेक्ट अब अपनी सफलता के अंतिम चरण में पहुंच चुका है। हाल ही में इस ट्रेन ने चुनौतीपूर्ण घाट खंड पर अपने सभी परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं।

चुनौतीभरा घाट खंड और सफल परीक्षण

मैंगलोर टुडे न्यूज़ नेटवर्क की रिपोर्ट के अनुसार, बेंगलुरु और मंगलुरु के बीच प्रस्तावित वंदे भारत एक्सप्रेस ने बेहद चुनौतीपूर्ण सकलेशपुर-सुब्रह्मण्य रोड घाट खंड पर कई सफल परीक्षण रन पूरे करके एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि हासिल की है।

इस 55 किलोमीटर लंबे खंड पर, जिसमें 1:50 तक की तीव्र ढलान है, 12, 13, 17, 18, 19 और 20 अगस्त को परीक्षण आयोजित किए गए, जिसमें ट्रेन के प्रदर्शन और सुरक्षा का बारीकी से आकलन किया गया।

दक्षिण पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक ने भी इन परीक्षणों के दौरान व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया था। गुरुवार को अंतिम परीक्षण के बाद यह रैक सुब्रह्मण्य से मंगलुरु की ओर रवाना हुआ।

अनुसंधान डिजाइन और मानक संगठन (RDSO) के विशेषज्ञों ने इन परीक्षणों का पर्यवेक्षण किया, जिसमें गति नियंत्रण, ड्राइविंग प्रदर्शन, ब्रेकिंग दूरी और अन्य सुरक्षा मापदंडों की जांच की गई।

वेस्टर्न घाट की खाइयों और पहाड़ों के बीच चुनौतीभरा रूट

इस पूरे रेल मार्ग पर सबसे रोमांचक और कठिन हिस्सा सकलेशपुर और सुब्रमण्य के बीच का 55 किलोमीटर का स्ट्रेच है, जो पूरी तरह से पश्चिमी घाट (Western Ghats) की खतरनाक पहाड़ियों से होकर गुजरता है। इन दुर्गम रास्तों पर काबू पाने के लिए रेलवे ने अभूतपूर्व काम किए हैं:

इस रूट पर कई टनल (सुरंगें) और गहरी खाइयों को पाटने के लिए पुलों का निर्माण किया गया है, और रूट को तीखे कर्व्स के हिसाब से तैयार किया गया है।

इस रूट की ढलान इतनी तेज है (1:50 तक का ग्रेडिएंट) कि मानसून के दौरान यहां लैंडस्लाइड, रॉक फॉल और सॉइल इरोजन का खतरा हमेशा बना रहता है।

इसके अलावा, दिसंबर 2025 तक इस पूरे रूट का विद्युतीकरण (Electrification) सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया था।

घाट खंड के लिए विशेष रैक और ब्रेकिंग सिस्टम

सामान्य ट्रेनों को ढलान वाले रूट पर चलाने और रोकने के लिए आगे और पीछे अतिरिक्त लोकोमोटिव बैंकर्स लगाए जाते हैं। लेकिन वंदे भारत एक 'सेल्फ-प्रोपेलड' ट्रेन है, जो ऐसे पारंपरिक बैंकर इंजनों के साथ नहीं चल सकती।

इस समस्या का समाधान निकालते हुए चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) में इस रूट के लिए विशेष तौर पर 20 कोचों वाला वंदे भारत रैक निर्मित किया गया था। यह रैक मैसूरु पहुंचा और 11 अगस्त को सकलेशपुर ले जाने से पहले इसका स्थिर परीक्षण किया गया था।

इस विशेष रैक में स्वचालित आपातकालीन ब्रेक (AEB) प्रणाली फिट की गई है। रेल सुरक्षा आयुक्त ने सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए इस घाट खंड पर ट्रेन की अधिकतम गति 30 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की है।

शीघ्र शुरू होगी सेवा

गुरुवार को अंतिम परीक्षण पूरा होने के बाद अब इस रैक को दक्षिण पश्चिम रेलवे को सौंप दिया जाएगा, और यात्री वाणिज्यिक परिचालन शुरू होने से पहले शेष स्वीकृतियों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हर तरफ हरी-भरी वादियों के बीच से गुजरने वाले इन सफल फील्ड ट्रायल्स के बाद, अब औपचारिकताएं पूरी होते ही इस सेवा के शीघ्र शुरू होने की पूरी उम्मीद है।

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