आगरा में विकास या विकार की दौड़: मेट्रो का रोमांच और 'कालेजों' के मैदानों का बलिदान

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ताज की नगरी आगरा में इन दिनों विकास की एक नई और अजीब पहेली चल रही है—"घर से निकलो तो मेट्रो का दर्शन पाओ, और भीषण जाम में फंसकर वापस लौट जाओ!" सचमुच, आगरा के बाशिंदे वाकई बड़े दिल वाले हैं, जो शहर में चल रहे इस 'विकास' और अंतहीन मरम्मत के नाम पर रोजाना अपने कीमती घंटे सड़कों पर होम (बर्बाद) कर रहे हैं। जिस शहर की वैश्विक पहचान कभी प्यार और मोहब्बत की दास्तानों से होती थी, वहां आज मेट्रो के नाम पर चारों तरफ हो रही खुदाई को देखकर लगता है कि हम 'लव-स्टोरी' से निकलकर 'खोदाई-स्टोरी' के नए दौर में प्रवेश कर चुके हैं।

हैरानी की बात तो यह है कि दुनिया भर को अपनी खूबसूरती से आकर्षित करने वाले इस ऐतिहासिक शहर को आखिर मेट्रो का ऐसा कौन सा 'तीव्र दौरा' पड़ा था, जिसके लिए यहां के बड़े-बड़े ऐतिहासिक आगरा कॉलेज और आरबीएस (RBS) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के विशाल खेल के मैदान इस तथाकथित विकास की वेदी पर समर्पित कर दिए गए?

कंक्रीट के खंभों के बीच खो गया बचपन

कभी जिन मैदानों में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, युवा खिलाड़ी पसीना बहाते थे, वहां अब कंक्रीट के बेजान खंभे अट्टहास कर रहे हैं। इसे देखकर ऐसा लगता है मानो हमारी भावी पीढ़ी को यह मूक संदेश दिया जा रहा है कि—"मैदानों में दौड़ने-भागने से अब कुछ नहीं मिलने वाला, सीधे मेट्रो में चढ़ो और उड़ जाओ!"

इस तथाकथित विकास की अजब दास्तान के पीछे सबसे दिलचस्प पहलू यहाँ की 'राजनीतिक समरसता' है। जब क्षेत्र के विधायक से लेकर सांसद तक सब एक ही 'डबल इंजन' (या कहिए एक ही थाली) के हिस्से हों, तो फिर जनता की तरफ से विपक्ष की कमी कौन खेले? राजनीतिक एकाधिकार का नतीजा यह निकला है कि आगरा शहर 'कूपमंडूक' (कुएं के मेंढक) वाली राजनीति का शिकार होकर रह गया है।

चमकते स्टेशनों के पीछे बदहाल बुनियादी ढांचा

विकास के नाम पर वातानुकूलित (AC) योजनाएं तो ऊपर से सीधे जमीन पर उतारी जा रही हैं, लेकिन शहर की मौलिक जरूरतें आज भी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं:

टूटी सड़कें और गड्ढे: मुख्य मार्गों से लेकर आंतरिक कॉलोनियों तक की सड़कें खस्ताहाल हैं।

सीवर की गंभीर समस्या: हल्की बारिश में भी शहर के कई इलाके जलमग्न हो जाते हैं।

बदहाल पार्किंग व्यवस्था: पर्यटकों और स्थानीय निवासियों के लिए व्यवस्थित पार्किंग आज भी एक 'अधूरी कहानी' बनी हुई है।

नेताओं और योजनाकारों को अब यह गंभीरता से समझना होगा कि कोई भी ऐतिहासिक शहर सिर्फ मेट्रो के कंक्रीट खंभों और चमकीले स्टेशनों से नहीं, बल्कि वहां के नागरिकों की खुली सांसों और मजबूत बुनियादी सुविधाओं से जिंदा रहता है।

आखिर कब तक...?

आखिर कब तक आगरावासी इस विकास के नाम पर हर रोज ट्रैफिक जाम के घूंट पीते रहेंगे और अपनी ही चिर-परिचित गलियों में अजनबी बनने को मजबूर होंगे? विकास बेहद जरूरी है, और इसका स्वागत होना चाहिए, लेकिन यह शहर की ऐतिहासिक आत्मा को घायल करके नहीं, बल्कि उसे सहेजकर और संवारकर आना चाहिए।

अन्यथा, वह दिन दूर नहीं जब पर्यटकों को ताजमहल का दीदार कराने के लिए भी गाइडों को मेट्रो के ही किसी ऊंचे खंभे पर चढ़कर दूरबीन लगानी पड़ेगी!

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