'कक्षा 9 में तीसरी भाषा शुरू नहीं, बल्कि खत्म होनी चाहिए': सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस नागरत्ना का शिक्षा नीति पर बड़ा बयान
सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस बी.वी. नागरत्ना (Justice BV Nagarathna) ने देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था और भाषा नीति को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और व्यावहारिक विचार साझा किया है। जस्टिस नागरत्ना ने त्रि-भाषा सूत्र (Three-Language Formula) पर अपनी बेबाक राय रखते हुए कहा कि स्कूली छात्रों पर से पढ़ाई का बोझ कम करने के लिए तीसरी भाषा को कक्षा 9 में शुरू करने के बजाय, उसे नौवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते समाप्त कर दिया जाना चाहिए।
नई दिल्ली में आयोजित एक शिक्षा संगोष्ठी के दौरान उन्होंने यह बात कही, जहां उन्होंने स्कूली पाठ्यक्रम में भाषाओं के चयन और बच्चों के मानसिक विकास पर इसके प्रभाव पर खुलकर चर्चा की।
कक्षा 9 में नई भाषा सीखना छात्रों पर मानसिक बोझ
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था या कुछ बोर्ड्स में जिस तरह कक्षा 9 में पहुंचकर एक नई तीसरी भाषा को अनिवार्य या शुरू किया जाता है, वह छात्रों के लिए सही नहीं है।
तनावपूर्ण समय: कक्षा 9 और 10 छात्रों के करियर का एक बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव होता है, जहां उन पर बोर्ड परीक्षाओं, विज्ञान और गणित जैसे मुख्य विषयों का पहले से ही भारी दबाव होता है।
शुरुआती उम्र में सीखें भाषा: उन्होंने तर्क दिया कि कोई भी नई भाषा सीखने की सबसे सही उम्र बचपन (प्राइमरी और मिडिल स्कूल) होती है। इसलिए तीसरी भाषा की पढ़ाई कक्षा 5 या उससे पहले शुरू होकर कक्षा 9 में प्रवेश करने से पहले ही पूरी हो जानी चाहिए। नौवीं में आकर बच्चों को मुख्य विषयों पर ध्यान केंद्रित करने की छूट मिलनी चाहिए।
मातृभाषा (Mother Tongue) के महत्व पर दिया जोर
अपने संबोधन में जस्टिस नागरत्ना ने प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा के महत्व को सर्वोपरि बताया। उन्होंने कहा:
"प्राथमिक स्तर पर बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा देना उनके मानसिक और संज्ञानात्मक (Cognitive) विकास के लिए सबसे उत्तम है। जब बच्चा अपनी मातृभाषा में अवधारणाओं (Concepts) को समझता है, तो उसका आधार मजबूत होता है।"
उन्होंने स्पष्ट किया कि अंग्रेजी या अन्य वैश्विक भाषाएं सीखना आज के दौर की जरूरत हो सकता है, लेकिन यह अपनी क्षेत्रीय भाषाओं और मातृभाषा की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के संदर्भ में अहम विचार
जस्टिस नागरत्ना का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश भर में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत स्कूली पाठ्यक्रमों और भाषा के नियमों में बड़े बदलाव किए जा रहे हैं। उनके इस व्यावहारिक सुझाव की शिक्षाविदों और अभिभावकों के बीच काफी सराहना हो रही है। जानकारों का भी मानना है कि नौवीं कक्षा में एक बिल्कुल नई भाषा को थोपने से बच्चे भाषा को सिर्फ पास होने के लिए रटते हैं, उसे सीख नहीं पाते।