अंतरिक्ष में भारत का 'आगमन': Skyroot के Vikram-1 ने रचा इतिहास, बना देश का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट
भारतीय अंतरिक्ष सेक्टर ने एक नया स्वर्णिम अध्याय लिख दिया है। हैदराबाद आधारित प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) ने देश के पहले निजी बहु-चरणीय (multi-stage) कक्षीय रॉकेट 'विक्रम-1' (Vikram-1) को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है। इस ऐतिहासिक अभियान को 'मिशन आगमन' का नाम दिया गया था।
इस सफल प्रक्षेपण के साथ ही भारत ने दुनिया के एक बेहद खास और विशिष्ट क्लब में एंट्री ले ली है। भारत अब अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा ऐसा देश बन गया है, जिसके पास अपनी निजी कक्षीय प्रक्षेपण (Private Orbital Launch) क्षमता मौजूद है। अब तक भारत के सभी अंतरिक्ष अभियानों का नेतृत्व पूरी तरह सरकारी वित्त पोषित संस्था 'इसरो' (ISRO) द्वारा किया जाता था।
कैसा है विक्रम-1 रॉकेट? जानें इसकी ताकत
विक्रम-1 कोई साधारण रॉकेट नहीं है, बल्कि इसे भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर बेहद आधुनिक तकनीकों से तैयार किया गया है:
चार चरणों वाला प्रणोदन: यह एक 4-स्टेज रॉकेट है, जिसके पहले तीन चरणों में सॉलिड (ठोस) ईंधन और आखिरी यानी चौथे चरण में लिक्विड (तरल) ईंधन का इस्तेमाल किया गया है।
लाइटवेट कार्बन बॉडी: करीब 7 मंजिला ऊंचे इस रॉकेट की पूरी संरचना 'कार्बन कंपोजिट' से बनी है। यह स्टील या एल्युमीनियम की तुलना में कई गुना मजबूत और वजन में बहुत हल्का है।
पेलोड ले जाने की क्षमता: विक्रम-1 पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में 350 किलोग्राम तक और 500 किमी की सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (SSO) में 290 किलोग्राम तक का वजन आसानी से ले जा सकता है।
3D-प्रिंटेड इंजन: स्काईरूट का बड़ा गेम-चेंजर
इस रॉकेट की सबसे बड़ी खासियत इसका 'रमन इंजन' है, जिसे एडवांस 3D प्रिंटिंग (एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग) तकनीक से बनाया गया है। पारंपरिक इंजनों में दर्जनों कल-पुर्जों को वेल्डिंग के जरिए जोड़ा जाता है, जिससे तकनीकी खराबी का खतरा रहता है। लेकिन 3D प्रिंटिंग के कारण स्काईरूट का यह इंजन सिर्फ एक सिंगल-पीस कंपोनेंट के रूप में तैयार हुआ है। इससे इंजन का वजन 50% कम हो गया है और निर्माण में लगने वाला समय 80% तक घट गया है।
अंतरिक्ष में भेजे गए ये 6 खास पेलोड
विक्रम-1 अपने साथ कुल 6 महत्वपूर्ण प्रयोगात्मक उपग्रह और पेलोड लेकर गया है, जिनमें शामिल हैं:
एम्ब्रेस (Embrace): कॉस्मोसर्व स्पेस का एक रोबोटिक आर्म, जो अंतरिक्ष के कबाड़ (Space Debris) को पकड़ने की तकनीक प्रदर्शित करेगा।
सोलरास (Solaras): ग्रहा स्पेस द्वारा तैयार किया गया एक सैटेलाइट।
SCOPE: स्काईरूट का खुद का एक प्रायोगिक उपग्रह।
uD3PP और mD3RN: जर्मनी की कंपनी 'डीक्यूबेड' द्वारा तैयार किए गए तकनीकी प्रदर्शक।
कॉस्मिक ब्लूम: कॉस्मॉस डायमंड्स का एक विशेष प्रोजेक्ट।
अनोखी श्रद्धांजलि: सूक्ष्म कलाकार अजय कुमार मत्तेवाड़ा द्वारा चावल के दानों पर उकेरी गई भारत के तीन महान वैज्ञानिकों— डॉ. विक्रम साराभाई, सर सी.वी. रमन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की सूक्ष्म कलाकृतियां भी इस मिशन का हिस्सा बनीं।
बाजार की चुनौतियाँ और भविष्य की राह
स्काईरूट की यह कामयाबी असाधारण है, क्योंकि इलेक्ट्रॉन और खुद इसरो के SSLV जैसे रॉकेट भी अपने पहले प्रयास में सफल नहीं हो पाए थे। हालांकि, प्राइवेट स्पेस मार्केट में आगे की राह आसान नहीं है। वैश्विक स्तर पर 'स्पेसएक्स' (SpaceX) के फाल्कन-9 जैसे बड़े रॉकेट बेहद कम कीमत पर छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेज देते हैं (राइडशेयर)। ऐसे में स्काईरूट जैसे समर्पित छोटे लॉन्चर्स के सामने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम कीमत पर अपनी सेवाएं देने और खुद को 'अंतरिक्ष की टैक्सी' के रूप में स्थापित करने की बड़ी चुनौती होगी।
फिर भी, भारत में 2020 के स्पेस रिफॉर्म्स और IN-SPACe के गठन के बाद अंतरिक्ष स्टार्टअप्स की संख्या 400 के पार पहुंच चुकी है, जो यह दर्शाती है कि भारत का प्राइवेट स्पेस इकोसिस्टम अब दुनिया पर राज करने के लिए तैयार है।