मासूमों के लिए मसीहा बनी सी-पैप मशीन
- आगरा के SN मेडिकल कॉलेज में हर साल बच रही 1650 जान
- बिना नली डाले फेफड़ों तक पहुंचती है सांस
- यूपी-एमपी और राजस्थान के नवजातों को मिल रहा नया जीवन
आगरा। राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वे-5 के अनुसार उत्तर प्रदेश में एक हजार में से 28 नवजातों की मृत्यु विभिन्न कारणों से हो जाती है। इस मृत्यु दर को कम करने में प्रदेश में काम कर रहे एसएनसीयू (सिक न्यू बॉर्न केयर यूनिट) बेहतरीन भूमिका निभा रहे हैं। इसी कड़ी में एसएनसीयू में स्थापित सी-पैप मशीनें नवजातों के लिए वरदान साबित हो रही हैं। आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग में स्थापित एसएनसीयू में हर साल लगभग 1650 नवजातों का सफल उपचार करके उनकी जान बचाई जा रही है। यहाँ केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि राजस्थान और मध्य प्रदेश से आने वाले नवजात शिशुओं को भी नया जीवन मिल रहा है।
बाल रोग विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) पंकज कुमार ने बताया कि सी-पैप द्वारा एक निश्चित अनुपात में ऑक्सीजन व हवा को नाक के जरिए फेफड़ों तक पहुंचाया जाता है, जिससे बच्चे को सांस लेने में आसानी होती है। वेंटिलेटर की तुलना में सी-पैप के फायदे कहीं ज्यादा हैं। इससे वेंटिलेटर द्वारा होने वाले साइड इफेक्ट्स काफी कम हो जाते हैं। इसमें अस्पताल का कम स्टाफ भी उपयोग होता है और बच्चे की केएमसी (कंगारू मदर केयर) भी जल्दी शुरू हो जाती है।
बाल रोग विशेषज्ञ प्रो. (डॉ.) नीरज यादव ने बताया कि सी-पैप एक नॉन इनवेसिव वेंटिलेशन है। इसमें बच्चे के गले में नली डालने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि नाक के जरिए ही फेफड़े फुलाने की कोशिश की जाती है। इसके साइड इफेक्ट्स कम हैं, संसाधन कम लगते हैं और यह बेहद असरदार है। उन्होंने बताया कि जो बच्चे प्री-मैच्योर (समय से पहले जन्म लेने वाले) होते हैं, उनके फेफड़ों में सर्फेक्टेंट की कमी होती. है। इस वजह से उनके फेफड़े ठीक से काम नहीं करते और उनके सिकुड़ने-फूलने की शक्ति कम होने से बच्चे को सांस लेने में गंभीर कठिनाई होती है। ऐसे बच्चों को सी-पैप सपोर्ट की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है, जिससे बच्चा धीरे-धीरे पूरी तरह स्वस्थ हो जाता है।
डॉ. नीरज यादव के मुताबिक, बाल रोग विभाग में लगभग 24 बेड की नर्सरी है, जहां साल भर में करीब 1800 मरीज एडमिट होते हैं और 1650 से अधिक नवजात पूरी तरह ठीक होकर घर लौटते हैं। इनमें 25 प्रतिशत संख्या प्री-मैच्योर बच्चों की होती है। अस्पताल में 800 से 1000 ग्राम (एक किलो से कम) वजन के बच्चे भी पूरी तरह स्वस्थ होकर जा चुके हैं। एसएन मेडिकल कॉलेज आगरा के आसपास के करीब 10 जिलों को स्वास्थ्य लाभ दे रहा है, जिसमें राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर और मध्य प्रदेश के भिंड व मुरैना जैसे जिले शामिल हैं।
केस स्टडी 1: हाथरस की पूनम के बच्चे को मिला नया जीवन
हाथरस निवासी पूनम ने बताया कि उनके बच्चे का जन्म समय से पहले (7 महीने 28 दिन) एक निजी हॉस्पिटल में हुआ था। बच्चे का वजन केवल दो किलोग्राम था और जन्म के समय मुंह में गंदा पानी चले जाने के कारण वह सांस नहीं ले पा रहा था। प्राइवेट डॉक्टर ने हाथ खड़े करते हुए बच्चे को कहीं और ले जाने को कह दिया। इसके बाद परिजन बच्चे को तुरंत एसएन मेडिकल कॉलेज लेकर आए। यहाँ बच्चे को एसएनसीयू में भर्ती कर छह दिन तक वेंटिलेटर पर और फिर चरणबद्ध तरीके से छह दिन तक बबल सी-पैप सपोर्ट पर रखा गया। अब बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है और उसे केएमसी वार्ड में नॉर्मल हवा में रखा गया है।
केस स्टडी 2: धौलपुर की सुमन के बच्चे को मिला सहारा
राजस्थान के धौलपुर जिले से आई 27 वर्षीय सुमन ने बताया कि उनके इलाके के कई बच्चों को एसएन मेडिकल कॉलेज में नया जीवन मिला है। इसलिए जब जन्म के छठे दिन उनके बच्चे की तबीयत खराब हुई, तो वे सीधे आगरा आए। यहाँ 18 अप्रैल को बच्चे का इलाज शुरू हुआ। डॉक्टरों के अनुसार बच्चे को गंभीर संक्रमण (इंफेक्शन) था और सांस लेने में दिक्कत थी। उसे सी-पैप सपोर्ट पर रखा गया, जिससे वह पूरी तरह ठीक होकर अपने घर लौट चुका है। सुमन ने कहा कि एसएन मेडिकल कॉलेज आना उनके लिए वरदान बन गया।
प्रधानाचार्य का संदेश: "एसएनसीयू में केवल आगरा ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों और राजस्थान व मध्य प्रदेश के एक दर्जन जिलों से गंभीर मरीज आते हैं। हमारी डॉक्टरों और पैरामेडिकल की टीम पूरी मेहनत से इन नवजातों का उपचार करके उनकी जान बचा रही है।" - डॉ. प्रशांत गुप्ता, प्रधानाचार्य (एसएन मेडिकल कॉलेज)