सड़कों पर शोर, पर संसद में गायब: भारत की संसद से क्यों दूर है Gen Z?

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हाल ही में पारित हुए प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक-रोधी कानून (Public Examinations Bill) के दौरान भारतीय संसद में एक अनूठा दृश्य देखने को मिला। सांसदों ने अपनी बात को युवा वर्ग तक पहुँचाने के लिए इंटरनेट और सोशल मीडिया पर लोकप्रिय Gen Z शब्दावली—जैसे 'Delulu', 'FOMO', 'MIA' और 'Clock it'—का खूब इस्तेमाल किया। हालाँकि, इस बहस ने एक बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है: सड़कों और सोशल मीडिया पर अपनी आवाज़ उठाने वाली 'Gen Z' (1997 से 2012 के बीच जन्मे युवा) आखिर देश की संसद से गायब क्यों है?

​संसद में गूंजी Gen Z की भाषा, पर युवा चेहरे नदारद

​हालिया संसदीय बहस में जहाँ सत्तापक्ष और विपक्ष एक-दूसरे पर निशाना साधने के लिए युवा पीढ़ी के स्लैंग्स (Slang) का सहारा ले रहे थे, वहीं यह साफ दिखाई दिया कि नीति निर्माण की इस सबसे बड़ी मेज पर युवाओं का सीधा प्रतिनिधित्व बेहद कम है।

​आबादी बनाम प्रतिनिधित्व: भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है, जहाँ की औसतन 60% से अधिक आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। इसके बावजूद, संसद (लोकसभा और राज्यसभा) में Gen Z और युवाओं की हिस्सेदारी बेहद नगण्य बनी हुई है।

​सड़कों से सोशल मीडिया तक एक्टिव: प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली, बेरोजगारी और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर यही युवा सड़कों (जैसे जंतर-मंतर) से लेकर इंस्टाग्राम रील्स और टेलीग्राम ग्रुप्स तक सबसे ज्यादा मुखर हैं, लेकिन चुनावी राजनीति में उनकी जगह अभी भी काफी सीमित है।

​Gen Z के संसद से दूर रहने के 4 बड़े कारण

​विश्लेषकों और युवा नेताओं के अनुसार, Gen Z की संसद में कम मौजूदगी के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित कारक ज़िम्मेदार हैं:

​चुनावी राजनीति में ऊंची उम्र सीमा: भारत में लोकसभा या विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु सीमा 25 वर्ष है। ऐसे में Gen Z का एक बड़ा हिस्सा कानूनी रूप से चुनाव लड़ने के योग्य ही नहीं हो पाता।

​वंशवाद और वित्तीय बाधाएँ: मुख्यधारा की राजनीति में युवा कार्यकर्ताओं के लिए बिना किसी मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि (वंशवाद) या भारी आर्थिक बजट के चुनाव टिकट हासिल करना बेहद कठिन होता है।

​पारंपरिक राजनीति से मोहभंग: डिजिटल युग में पली-बढ़ी Gen Z पारंपरिक राजनीतिक ढर्रे और वादों से हटकर त्वरित पारदर्शिता, जवाबदेही और मुद्दों पर आधारित राजनीति चाहती है।

​इंटरनेट आधारित जन-आंदोलन: यह पीढ़ी अपनी बात सीधे मंचों पर रखने के लिए सोशल मीडिया, रील्स और डिजिटल अभियानों का सहारा ले रही है, जिससे उनका ध्यान चुनावी ढाँचे से ज्यादा त्वरित जनांदोलनों पर केंद्रित हो गया है।

नेताओं का प्रयास: केवल भाषा बदलना या बदलाव लाना?

​जहाँ कई सांसद संसद में युवाओं की भाषा बोलकर खुद को उनसे जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं छात्र संगठनों और युवा प्रतिनिधियों का मानना है कि केवल इंटरनेट स्लैंग बोलने से समस्याओं का समाधान नहीं होगा। युवाओं की वास्तविक मांगें—जैसे पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, रोजगार के अवसर और नीति-निर्माण में सीधा प्रतिनिधित्व—तभी पूरी हो सकती हैं जब राजनीतिक दल युवाओं को केवल वोट बैंक न मानकर मुख्यधारा की राजनीति में आगे लाएँ।

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