डिजिटल सिनेमा के ‘मसाले’ से लेकर कला की कद्र तक: ओटीटी, सोशल मीडिया और सेंसरशिप पर बड़ा मंथन

4,007 readers

डिजिटल क्रांति के इस दौर में ओटीटी (OTT) और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने मनोरंजन की पूरी परिभाषा ही बदलकर रख दी है। आज एक तरफ जहाँ नए कलाकारों और निर्देशकों के लिए अपनी प्रतिभा दिखाने के रास्ते खुले हैं, वहीं दूसरी तरफ कंटेंट में बढ़ती अश्लीलता, क्राइम और गिरती गुणवत्ता (क्वालिटी) को लेकर एक गंभीर चिंता पैदा हो गई है। इसी ज्वलंत विषय पर 'TNF Today' के बैनर तले आयोजित 'कला मंथन' के मंच पर शहर के वरिष्ठ कलाकारों, निर्देशकों, अधिवक्ताओं और विचारकों ने अपनी बेबाक राय रखी।

कंटेंट का बढ़ता 'मसाला' और सेंसरशिप की व्यावहारिक चुनौती

आजकल डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर टिके रहने और अपने कंटेंट को बेचने के लिए कॉमेडी और हिंसा का सहारा लिया जा रहा है। स्क्रीन पर परोसे जा रहे इस खुलेपन ने दर्शकों की मानसिकता को बुरी तरह प्रभावित किया है। बाजार की इस अंधी दौड़ में दर्शकों का मन भी इस मसालेदार कंटेंट का आदी होता जा रहा है, जो समाज के मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब जनता को एक बार इस तरह के तीखे और मसालेदार कंटेंट का स्वाद लग जाता है, तो उन्हें वापस सादा और साफ-सुथरा सिनेमा परोसना बेहद मुश्किल काम हो जाता है। हालांकि, इस बदलाव को लागू करना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि सेंसरशिप को सख्ती से लागू करने पर कई तरह की व्यावहारिक समस्याएं आड़े आती हैं।

सोशल मीडिया का प्रभाव और बच्चों के भविष्य पर मंडराता खतरा

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर तो सरकारी नियम या सेंसरशिप लागू की जा सकती है, लेकिन सोशल मीडिया को पूरी तरह नियंत्रित करना नामुमकिन है। आज सबसे बड़ी चिंता मासूम बच्चों को लेकर है, जिनके हाथों में हर वक्त स्मार्टफोन रहता है। इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर कई कंटेंट क्रिएटर्स और इन्फ्लुएंसर्स जरूरत से ज्यादा बोल्ड सामग्री परोस रहे हैं, जिसका सीधा और एडल्ट कंटेंट बच्चों की मानसिकता पर गहरा असर डाल रहा है।

विशेष विचार:

डॉ. ज्योति धौलिया:

"हमें यह स्वीकार करना होगा कि बाजार का काम सिर्फ मनोरंजन है, लेकिन विवेक हमारा अपना होना चाहिए। आज इस डिजिटल और आधुनिक बाजार में हर तरफ का रंग, हर तरह की मानसिकता और हर स्तर का कंटेंट खुलापन उपलब्ध है—अनंतर भी और भूला भी। कोई भी आपको कुछ परोस नहीं सकता। आखिरकार सच इस हुआ बात पर डिपेंड करता है कि एक संगठन और एक व्यक्ति के रूप में आपकी खुद की भूख कैसी है। इस विशाल मार्केट में से हमें अपने जीवन और अपनी संस्कृति के लिए क्या चुनना है और किसे नकारना है, इसका पूरा दारोमदार और आखिरी फैसला सिर्फ और सिर्फ हम पर है।"

सुरज तिवारी (फिल्म लेखक एवं निर्देशक):

"आज अंगारा और अल-चला के क्षेत्रो से हमारे स्थानीय कलाकार बिना किसी बड़े सपोर्ट के वेब सीरीज, शॉर्ट फिल्म्स और थियेटर पर लगातार बेहतरीन काम कर रहे हैं। फिल्म, एनिमेशन और VFX को मिलाकर यह दुनिया जो सबसे बड़ी इंडस्ट्रीज में से एक है, जिस पर उत्तर प्रदेश सरकार ने बेहतरीन फिल्म नीति के तहत सब्सिडी दी है, वहीं हमारे लोकल व्यापारियों और कलाकारों का ध्यान इस तरफ नहीं है। 'TNF Today' के इस 'कला मंथन' मंच का मुख्य उद्देश्य यही है कि हम सही टैलेंट और सही प्रोजेक्ट्स को सामने लाएं ताकि फिल्ममेकर को पैसा सुरक्षित मिल सके।"

संजय कुमार (अभिनेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता):

"आज के समय में ओटीटी (OTT) और विभिन्न पैटफॉर्म्स पर जो कंटेंट परोसा जा रहा है, वह बहुत गंभीर विषय है। यह हमारे परिवारों को आपस में और जो ले रहा है इससे हमारी संस्कृति और धर्म को बड़ा नुकसान हो रहा है। भारतीय सिनेमा का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है, जहाँ किष्किंधा पर लगन लगाने और अयोध्या राधिका देखने के लिए 1951 में सेंसर बोर्ड की स्थापना की गई थी, लेकिन आज के डिजिटल दौर में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर अंकुश लगाना बेहद जरूरी हो गया है। आज यूथ के वेष में अप्रचलित भाषा और गंदी गालियों को आम बात समझा जा रहा है, जिससे हमारी बुनियादी पीढ़ी और बच्चों का मानसिक संतुलन बिगड़ रहा है।"

राहुल गुप्ता:

"सच्चाई तो यह है कि आज कला के कलाकारों के लिए ओटीटी (OTT) एक तरह से आईपीएल (IPL) बन चुका है, जहाँ हर किसी को अपनी प्रतिभा दिखाने का एक बड़ा मौका मिल रहा है। सोशल मीडिया आज के दौर में अपनी कला को बाहर निकालने और दुनिया के सामने रखने का एक बहुत ही शानदार प्लेटफॉर्म बन गया है। आजकल के इस दौर में कंटेंट के रेसकार में हैरानी के भीतर की भावनात्मक्ता (भावनाएं) धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। जब कंटेंट में कोटीटी (गुणवत्ता) ही नहीं बची हो, तो लोक न्यूटन के चक्कर में दूध भी बन देते हैं, मर्यादा का कोई ख्याल नहीं रखा जा रहा।"

शिव तिवारी:

"मैं खुद 23-23 साल का हूं और काफी समय से मैं सब देखता आ रहा हूं। राज कपूर साहब के दौर से लेकर आज के 'सथानम इंडिया' जैसे सीन्स तक, स्क्रीन पर कुछ भी दिखा दिया जाता है और पब्लिक को उसे स्वीकार करना ही पड़ता है। लेकिन आज के समाज में जब सब कुछ पॉम में आ गया है, तो यूट्यूब, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर कुछ भी चल रहा है, कुछ कंटेंट क्रिएटर्स और इन्फ्लुएंसर्स तो अपनी मर्यादाएं भी भूल गए हैं, वे यह नहीं सोचते कि उनके ये वीडियोज मासूम बच्चों के पास भी जा रहे हैं। मेरे खुद के छोटे-छोटे भांजे हैं, जिनके हाथों में फोन है। जब बच्चे ये सब देखते हैं, तो उनकी मानसिकता पर क्या असर पड़ेगा, यह बेहद गंभीर बात है।"

डिजिटल युग के इस मोड़ पर सेंसरशिप के सख्त नियम और गाइडलाइंस समय की माँग हैं। लेकिन नियमों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण निर्माताओं (मेकर्स) की अपनी नैतिक जिम्मेदारी और दर्शकों की अपनी समझ है। डिजिटल दुनिया को पूरी तरह बंद करना संभव नहीं है, लेकिन इसके स्वरूप और दिशा में एक बड़ा व सकारात्मक बदलाव लाना अब बेहद जरूरी हो चुका है।

Related News

Share: