'कला मंथन' में उठी ब्रज के अस्तित्व की चिंता: पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकता की होड़ पर कड़ा प्रहार
सूरकक्ष में जुटा साहित्य, संस्कृति और विचारों का अनोखा समागम; विद्वानों ने कहा— "संस्कृति और भाषा की रक्षा से ही बचेगा हमारा अस्तित्व"
कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिंदी तथा भाषा विज्ञान विद्यापीठ (के.एम.आई.), डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के 'सूरकक्ष' में शुक्रवार को साहित्य, संस्कृति और विचारों का अनोखा समागम देखने को मिला। 'टीएनएफ टुडे' (TNF Today) और के.एम.आई. विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित साप्ताहिक वैचारिक एवं सांस्कृतिक शृंखला 'कला मंथन' के तीसरे पुष्प (तृतीय सत्र) का आयोजन अत्यंत गरिमामयी माहौल में संपन्न हुआ।
इस सत्र के दौरान "पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में उलझता ब्रज; हमारी संस्कृति, हमारे संस्कार" विषय पर गहन विचार-विमर्श किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि एवं केंद्रीय हिंदी संस्थान की पूर्व निदेशक डॉ. बीना शर्मा, विशिष्ट अतिथि डॉ. सुषमा सिंह और वरिष्ठ साहित्यकार राज बहादुर सिंह 'राज' सहित शहर के प्रख्यात विद्वानों, अधिवक्ताओं और विचारकों ने शिरकत की।
ब्रजभाषा, लोकगीतों और संस्कृति के क्षरण पर गहरी चिंता
गोष्ठी के दौरान वक्ताओं ने एक सुर में स्वीकार किया कि ब्रज क्षेत्र की समृद्ध पहचान आज अपनी मूल जड़ों से कट रही है। जब समाज अपनी भाषा, खान-पान, पहनावे और लोक परंपराओं से मुंह मोड़ लेता है, तो उसकी संस्कृति विलुप्त होने लगती है।
युवा पीढ़ी में बढ़ता प्रभाव: विद्वानों ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी पाश्चात्य शैली के फेर में आकर अपनी मातृभाषा ब्रज बोलने में झिझक महसूस करने लगी है। जब तक घर-परिवार और स्कूलों में बच्चों को अपनी भाषा और संस्कारों से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक यह स्थिति नहीं बदलेगी।
संवादहीनता और बिखरते परिवार: आधुनिक मनोरंजन के साधन और सोशल मीडिया पारिवारिक लोकगीतों, आपसी संवाद और आत्मीयता पर भारी पड़ रहे हैं। 'राम-राम' और 'राधे-राधे' की मिठास की जगह दिखावटी आधुनिकता ने ले ली है।
साहित्यकारों के मुख्य विचार
डॉ. बीना शर्मा (पूर्व निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान): "हमें स्वीकार करना होगा कि पाश्चात्य शैली के चक्कर में हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। भाषा और संस्कृति तभी तक जीवित रहती हैं जब हम उनका उपयोग अपने दैनिक जीवन और लोकगीतों में करते हैं। अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करना हम सभी की साझी जिम्मेदारी है।"
राज बहादुर सिंह 'राज' (वरिष्ठ कवि व साहित्यकार): "साहित्यिक ब्रजभाषा और क्षेत्रीय बोलियों के अंतर को समझना जरूरी है। हमें अपनी स्थानीय बोली में शर्मिंदा होने के बजाय उस पर गर्व करना चाहिए।"
डॉ. सुषमा सिंह (विशिष्ट अतिथि): "पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से परिवार में बड़ों का सम्मान और पारिवारिक मूल्य प्रभावित हो रहे हैं। अगर समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान खो देगा, तो राष्ट्र का स्वरूप भी कमजोर होगा।"
कवियित्री दया शर्मा एवं वीणा शर्मा: "मसालेदार मोबाइल कंटेंट और पाश्चात्य जीवनशैली ने पारिवारिक मिठास को खत्म कर दिया है। कविता और साहित्य ही समाज को सही दिशा देने का काम कर सकते हैं।"
राकेश निर्मल, प्रभुदत्त उपाध्याय एवं अन्य वक्ता: "ब्रज के जंगलों और कुंजों की तरह ही ब्रजभाषा का दायरा भी सिमट रहा है। टीवी, रील्स और सिनेमा के माध्यम से जो परोसा जा रहा है, वह हमारी संस्कृति के विपरीत है। हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को स्वामी विवेकानंद और दयानंद सरस्वती जैसे महापुरुषों के विचारों से जोड़ना होगा।"
कार्यक्रम के अंत में सभी विद्वानों ने एकजुट होकर यह संदेश दिया कि आधुनिकता का स्वागत होना चाहिए, लेकिन अपनी संस्कृति की कीमत पर नहीं।
घरों में मातृभाषा का उपयोग: परिवार के भीतर बच्चों से अपनी क्षेत्रीय भाषा (ब्रज) में बात करने की आदत डालें।
पाठ्यक्रम में शामिल हो स्थानीय साहित्य: स्कूलों के पाठ्यक्रम में क्षेत्रीय संस्कृति और ब्रज साहित्य को प्रमुखता दी जाए।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण: पश्चिमी चकाचौंध को कोसने के बजाय अपनी भाषा, साहित्य और संस्कारों को बढ़ावा देने के लिए लगातार ऐसे आयोजनों का होना जरूरी है।
कार्यक्रम का सफल संयोजन एडवोकेट संजय कुमार तथा धन्यवाद ज्ञापन आयोजक मंडल द्वारा किया गया। अंत में 'जय ब्रज वसुंधरा' और 'राधे-राधे' के उद्घोष के साथ इस गरिमामयी संवाद सत्र का समापन हुआ।