'कला मंथन' में गूँजा डिजिटल युग का संकट: "तकनीक को सेवक रहने दें, मालिक न बनने दें"
तकनीक का गुलाम बनने के बजाय इसका विवेकपूर्ण उपयोग करना होगा
डिजिटल क्रांति के इस दौर में जहाँ एक ओर मोबाइल ने जीवन को बेहद आसान बनाया है, वहीं दूसरी ओर इसने हमारी मानवीय संवेदनाओं, स्वास्थ्य और पारिवारिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। इसी गंभीर विषय पर मंथन करने के उद्देश्य से 'TNF Today' (थॉट्स न्यूज फैक्ट्स टुडे) एवं इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस (आई.एस.एस.), डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के संयुक्त तत्त्वावधान में सांस्कृतिक संवाद की साप्ताहिक श्रृंखला 'कला मंथन' का आयोजन किया गया।
पालीवाल पार्क स्थित आई.एस.एस. परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य विषय "मोबाइल के बढ़ते उपयोग से टूटते पारिवारिक रिश्ते: डिजिटल युग की चुनौतियाँ" रहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता एवं संचालन के बीच अधिवक्ताओं, शिक्षाविदों और साहित्यकारों ने समाज को इस 'डिजिटल महामारी' से बचाने के लिए एकजुट होकर प्रयास करने का आह्वान किया।
काव्य की छाँव में कड़वी सच्चाई: ब्रज भाषा में व्यंग्य-प्रहार
कार्यक्रम के प्रथम सत्र की शुरुआत साहित्यिक गरिमा के साथ हुई। आमंत्रित कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से माहौल को जीवंत कर दिया।
विशेष रूप से ब्रज भाषा में प्रस्तुत हास्य-व्यंग्य ने श्रोताओं को तालियाँ बजाने पर मजबूर कर दिया, लेकिन साथ ही सोचने पर भी विवश किया। कवियों ने अपनी रचनाओं में दर्शाया कि कैसे आज रसोई से लेकर शयनकक्ष तक मोबाइल ने अपनी जगह बना ली है। रील बनाने की सनक, बात-बात पर वीडियो कॉल, सोशल मीडिया की अफवाहें और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का डर आज हर घर में कलह की वजह बन रहा है। कवियों ने चुटीले अंदाज़ में कहा कि "आज इंसान अपनों से दूर और स्क्रीन के नज़दीक होता जा रहा है।"
स्कूली होमवर्क और मोबाइल निर्भरता पर तीखे सवाल
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि अशोक चौबे (डीजीसी रेवेन्यू) और वरिष्ठ अधिवक्ता नरेंद्र शर्मा ने बच्चों में बढ़ती मोबाइल की लत पर गहरी चिंता जताई।
वक्ताओं ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली की व्यावहारिक खामियों को उजागर करते हुए कहा कि एक तरफ तो सरकार और मुख्यमंत्री जी छोटे बच्चों को मोबाइल से दूर रखने की अपील करते हैं, वहीं दूसरी तरफ स्कूल अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर सारा होमवर्क और नोटिफिकेशन वॉट्सऐप पर भेज रहे हैं। बच्चा 5-6 घंटे स्कूल और ट्यूशन में बिताता है, फिर भी अभिभावकों को मजबूरी में उसके हाथ में स्मार्टफोन थमाना पड़ता है। पढ़ाई के नाम पर बच्चा स्क्रीन पर क्या देख रहा है, इस पर नजर रखना असंभव होता जा रहा है। वक्ताओं ने सरकार एवं प्रशासन से माँग की कि स्कूलों में पुरानी डायरी व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से बहाल किया जाए और मोबाइल पर होमवर्क भेजना बंद हो।
विद्वानों और अधिवक्ताओं का वैचारिक मंथन
कार्यक्रम में एडवोकेट बबिता शांत, डॉ. हृदयेश कुलश्रेष्ठ, एडवोकेट रूपेश भारद्वाज और अन्य वक्ताओं ने विषय के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला:
संवादहीनता और बिखरते परिवार: वक्ताओं ने कहा कि आज 'हम दो, हमारा एक' वाले एकल परिवारों में माता-पिता दोनों कामकाजी हैं। समय की कमी के कारण वे बच्चों को बहलाने के लिए मोबाइल थमा देते हैं। इसका दुष्परिणाम यह है कि चाची, ताऊ, मौसी जैसे आत्मीय रिश्ते बच्चों के जीवन से गायब हो रहे हैं और उनकी जगह भौतिकवादी गैजेट्स ने ले ली है।
गर्भावस्था से ही शुरू हो रहा खतरा: मुख्य वक्ता बबिता शांत ने कहा कि मोबाइल की लत का असर अब अजन्मे बच्चे पर भी पड़ रहा है। गर्भावस्था के दौरान माताओं द्वारा अत्यधिक स्क्रीन का उपयोग और प्रसव के तुरंत बाद बच्चों का स्क्रीन के संपर्क में आना उनके मानसिक विकास को प्रभावित कर रहा है। आज स्थिति यह है कि बच्चे बिना स्क्रीन देखे खाना तक नहीं खाते।
स्वास्थ्य और मानसिक तनाव: देर रात तक मोबाइल देखने से निकलने वाली ब्लू-लाइट दिमाग को भ्रमित करती है, जिससे अनिद्रा (Insomnia), तनाव और आँखों के रोग तेजी से बढ़ रहे हैं।
सकारात्मक पक्ष और सुरक्षा: वक्ताओं ने स्वीकार किया कि 1986 की संचार क्रांति के बाद मोबाइल ने कानूनी निर्णयों (रूलिंग्स), डिजिटल भुगतान (RTGS/NEFT) और ज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया है। मोबाइल बुरा नहीं है, बल्कि उसका 'ड्राइवर' (उपयोगकर्ता) कैसा है, यह बात मायने रखती है।
समाधान का मार्ग: 'डिजिटल फास्ट' और व्यावहारिक नियम
कार्यक्रम के अंत में वक्ताओं ने केवल समस्याओं पर रोने के बजाय व्यावहारिक समाधान अपनाने पर जोर दिया:
डिजिटल फास्ट (Digital Fast): हफ्ते में कम से कम एक दिन परिवार के सभी सदस्य मोबाइल पूरी तरह बंद रखकर एक-दूसरे के साथ समय बिताएँ।
नो-फ़ोन ज़ोन और पीक आवर्स: सुबह उठने के तुरंत बाद और शाम को परिवार के साथ रहने के 'पीक आवर्स' में मोबाइल से दूरी बनाएँ।
निजी व व्यावसायिक जीवन में सीमा: रात को व्यावसायिक कॉल्स बंद रखें ताकि मानसिक शांति बनी रहे।
बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम तय हो: बच्चों के लिए सोशल मीडिया और स्क्रीन का समय व उम्र सीमा सख्ती से लागू की जाए।
कार्यक्रम को सफल बनाने में संयोजक एडवोकेट संजय कुमार और संस्थापक व संपादक धीरज शर्मा की मुख्य भूमिका रही। आयोजकों ने कहा कि अखबार और मीडिया समाज को जागरूक करने का दर्पण हैं, और 'TNF Today' द्वारा उठाई गई यह मुहिम लगातार जारी रहेगी। अंत में मुख्य अतिथियों और सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम का समापन हुआ।