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दोहरा मापदंड भारत पर सख्त चीन पर नरम क्यों है पश्चिमी मीडिया

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लेखक- बृज खंडेलवाल, वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक
इतिहास गवाह है कि वैश्विक विमर्श को नियंत्रित करने वाले पश्चिमी न्यूज़रूम अक्सर विकासशील देशों विशेषकर भारत के प्रति एक खास तरह के पूर्वाग्रह से ग्रसित रहते हैं। मई 2026 में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे दौरे पर गए तो एक नॉर्वेजियन पत्रकार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद उनसे एक सवाल उछाल दिया कि भारत प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे से बहुत नीचे क्यों है। इसका वीडियो रातोंरात वायरल हो गया और पश्चिमी मीडिया ने इसे भारत में लोकतंत्र के गिरते स्तर की सबसे बड़ी मिसाल बनाकर पेश कर दिया। लेकिन यहाँ रुककर एक बड़ा और संजीदा सवाल पूछना आवश्यक है कि आखिरी बार कब किसी पश्चिमी पत्रकार ने चीन के प्रेस फ्रीडम रिकॉर्ड पर वैश्विक मंच पर इस तरह का सार्वजनिक तमाशा खड़ा किया था। चीन उन्हीं सूचियों में सबसे नीचे पायदान पर बैठा है फिर भी उसकी आलोचना कभी वैसी सुर्खियां नहीं बनाती जैसी भारत की छोटी सी कमी पर बना दी जाती है। यहीं से पश्चिमी मीडिया के दोहरे मापदंड की असली कहानी शुरू होती है जो भारत की आंतरिक चुनौतियों को हमेशा बहुत तेज रोशनी में दिखाता है। भारत में नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए को मुसलमानों के खिलाफ कदम बताया गया और किसान आंदोलन को तानाशाही प्रवृत्ति का अकाट्य सबूत कहा गया। कोविड की दूसरी लहर की भयावह तस्वीरों को पूरी दुनिया में बार बार दिखाया गया और चुनावों की कवरेज में हिंदू राष्ट्रवाद तथा बहुसंख्यकवाद पर लगातार सवाल उठाए गए। इस विषय पर पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी का यह कहना अत्यंत प्रासंगिक है कि इन मुद्दों पर रिपोर्टिंग होना गलत नहीं है क्योंकि पत्रकारिता का मूल काम ही सवाल पूछना है मगर यक्ष प्रश्न यह है कि भारत के लिए इस्तेमाल होने वाला लहजा इतना कड़ा और आक्रामक क्यों होता है जबकि चीन के मामले में वही तीखापन अक्सर गायब दिखाई देता है। चीन पर यह संगीन आरोप हैं कि उसने शिनजियांग में लाखों उइगर मुसलमानों को डिटेंशन कैंपों में रखा है और यह खबरें भी छपती हैं लेकिन चीन को लेकर पश्चिमी मीडिया में वैसा लगातार नैरेटिव कभी नहीं बनता कि वहां लोकतंत्र खतरे में है या पूरा सिस्टम टूट रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि दुनिया ने चीन जैसी बंद व्यवस्था से कभी लोकतंत्र की उम्मीद ही नहीं की जबकि भारत एक जीवंत लोकतांत्रिक देश है इसलिए उससे सदैव ऊंचे आदर्शों की उम्मीद की जाती है और जब वह उन आदर्शों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता तो उसकी आलोचना कहीं ज्यादा कठोर और निर्मम हो जाती है।
वरिष्ठ पत्रकार जोजफ़ का मानना है कि मीडिया सिर्फ खबरों से नहीं बल्कि शब्दों के चयन से भी वैश्विक धारणा का निर्माण करता है। भारत की रिपोर्टिंग के समय अक्सर बैकस्लाइडिंग मेजॉरिटेरियन और हिंदू नेशनलिज्म जैसे भारी भरकम और नकारात्मक शब्द सुनाई देते हैं। भारत के आंतरिक सामाजिक तनाव की रिपोर्टिंग में कई बार वही पुरानी औपनिवेशिक सोच झलकती है कि भारत एक बंटा हुआ भावनात्मक और अव्यवस्थित समाज है जिसे सदैव पश्चिमी मार्गदर्शन की आवश्यकता है। दूसरी तरफ चीन के लिए स्थिरता कुशल प्रशासन और अभूतपूर्व विकास जैसे सकारात्मक शब्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है। वहां की सख्त और दमनकारी सरकारी कार्रवाइयों को कभी कभी मजबूत शासन कहकर पेश किया जाता है और उसके आर्थिक विकास की जमकर तारीफ होती है जबकि मानवाधिकारों का सबसे बड़ा मुद्दा बहुत पीछे छूट जाता है। यह सिर्फ मीडिया का सामान्य झुकाव नहीं है बल्कि यह ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर की उस मानसिकता की परछाईं है जिसने कभी भारत को अंधविश्वासी और अव्यवस्थित बताकर अपने शासन को सही ठहराया था और आज वही सोच नए और परिष्कृत रूप में अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में दिखाई देती है। इस दोहरे मापदंड का एक बहुत बड़ा व्यावहारिक कारण भारत का अपना खुलापन भी है। भारत में प्रेस अपेक्षाकृत पूरी तरह स्वतंत्र और आजाद है जिसके कारण विदेशी पत्रकार यहाँ आसानी से घूम सकते हैं लोगों से मिल सकते हैं और विवादित मुद्दों पर खुलकर रिपोर्ट कर सकते हैं जिसके कारण भारत की कमियां ज्यादा बाहर आती हैं। इसके विपरीत चीन में विदेशी मीडिया पर सरकार का बेहद सख्त और अभेद्य नियंत्रण है जहां स्वतंत्र रिपोर्टिंग करना लोहे के चने चबाने जैसा है जिसका परिणाम यह होता है कि वहां की वास्तविक नकारात्मक खबरें बाहर ही नहीं निकल पातीं। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि भारत की स्थिति बदतर है बल्कि इसका सीधा मतलब सिर्फ इतना है कि भारत एक ज्यादा खुला और पारदर्शी समाज है। इसके साथ ही पश्चिमी देशों के चीन के साथ बहुत बड़े कारोबारी और रणनीतिक रिश्ते हैं जो परोक्ष रूप से मीडिया के माहौल को प्रभावित करते हैं क्योंकि चीन पर बहुत आक्रामक आलोचना कूटनीतिक तनाव को बड़ा सकती है जबकि लोकतांत्रिक साझेदार होने के नाते भारत पर सवाल उठाना अपेक्षाकृत बहुत आसान माना जाता है।

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