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जमीनी संघर्ष की भट्टी में तपे सनातन राष्ट्रवाद के सशक्त स्तंभ संजय मिश्रा

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सियासी सूरमा

ब्रांड वैल्यू के साए में सोई स्थानीय लीडरशिप पर प्रखर राष्ट्रवादी संजय मिश्रा का तीखा प्रहार

  • चार दशकों का अनवरत जमीनी संघर्ष: जानिए क्यों आयातित नेताओं की भीड़ में सबसे अलग हैं संजय मिश्रा
  • सत्ता के सुख में मजे ले रहे पैराशूट कार्यकर्ता और विपरीत दौर के तपे सिपाही संजय मिश्रा की असल हकीकत

समकालीन राजनीति के इस आपाधापी भरे दौर में जब सिद्धांतों पर अवसरवाद हावी होने लगा है तब वैचारिक शुचिता और निस्वार्थ सेवा भाव के साथ खड़े रहने वाले व्यक्तित्व विरले ही मिलते हैं। ताजनगरी आगरा की राजनैतिक और सामाजिक धरा पर संजय मिश्रा एक ऐसा ही चमकता हुआ नाम हैं जिनकी पहचान किसी पद या सत्ता की मोहताज नहीं है बल्कि उनका चार दशकों का निस्वार्थ जमीनी संघर्ष ही उनका असली परिचय है। वर्ष 1983 में बाल्यकाल में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्राथमिक शिक्षा वर्ग से जुडक़र राष्ट्र सेवा का जो संकल्प संजय मिश्रा ने लिया था वह आज एक विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है। वे एक सफल आयातक निर्माता और उद्यमी होने के साथ साथ सनातन संस्कृति और सामाजिक समरसता के प्रति पूरी तरह समर्पित एक बेहद गंभीर संवेदनशील और दूरदर्शी राजनेता हैं। जिनका पूरा जीवन राष्ट्रवाद की वेदी पर निस्वार्थ भाव से समर्पित रहा है।

विपरीत परिस्थितियों के तपे हुए सिपाही बनाम आयातित कार्यकर्ता
संजय मिश्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने संगठन और विचारधारा के लिए उस दौर में लाठियां खाईं और संघर्ष किया जब देश और प्रदेश में धुर विरोधी दलों की सरकारें हुआ करती थीं। राष्ट्रवाद की बात करना जहां राजनैतिक रूप से आत्मघाती माना जाता था उस दौर में उन्होंने वनवासी कल्याण आश्रम के महामंत्री और केशव धाम के उपाध्यक्ष जैसी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में रहकर विपरीत परिस्थितियों के बीच संगठन की नींव को मजबूत करने का ऐतिहासिक कार्य किया। संतोष रानी सोमनाथ सरस्वती शिशु मंदिर दहतोरा के प्रबंधक और अशोक सिंघल वात्सल्य विद्यापीठ फिरोजाबाद के महासचिव के रूप में उन्होंने भावी पीड़ी को संस्कारी बनाने का जो बीड़ा उठाया वह उनकी दूरगामी सोच को दर्शाता है। आज जब विचारधारा की सरकारें पूर्ण बहुमत में हैं और सत्ता का सुख भोगने के लिए तमाम अवसरवादी और आयातित कार्यकर्ता पैराशूट के जरिए मजे ले रहे हैं तब संजय मिश्रा जैसे निष्ठावान सिपाही बिना किसी लोभ के केवल संगठन हित में डटे हुए हैं। संकट के समय में जिन्होंने हर कार्यकर्ता और आम जनता की निस्वार्थ मदद की आज उनका यही त्याग उन्हें राजनीति की अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा करता है।

ब्रांड वैल्यू के साए में सोई लोकल लीडरशिप पर तीखा विजन
संजय मिश्रा का वर्तमान राजनीति को लेकर विजन अत्यंत व्यावहारिक और कड़वी सच्चाई को बयां करने वाला है। उनका स्पष्ट मानना है कि जो समाज और संगठन के लिए बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ या लालसा के काम करे वही वास्तव में सच्चा स्वयंसेवक और असली हिंदूवादी है। वे बड़ी बेबाकी से कहते हैं कि वर्तमान समय में भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष स्तर पर बैठे राष्ट्रीय नेता तो अद्भुत और देश हित में ऐतिहासिक कार्य कर रहे हैं लेकिन उनकी इसी प्रचंड ब्रांड वैल्यू का सहारा लेकर स्थानीय स्तर की राजनीति पूरी तरह चादर तानकर सोई हुई है। स्थानीय स्तर के नेता शीर्ष नेतृत्व के नाम पर चुनाव जीत जाते हैं मगर धरातल पर जनता और कार्यकर्ताओं की सुध लेने वाला कोई नहीं है। संजय मिश्रा का यह विजन बेहद दूरदर्शी है कि अब स्थानीय स्तर पर इस लचर व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन होना चाहिए और ब्रांड वैल्यू की आड़ में छिपे निकम्मेपन को हटाकर जमीन पर पसीना बहाने वाले योग्य पराक्रमी और कर्मठ व्यक्तियों को नेतृत्व का वास्तविक मौका मिलना चाहिए।

सर्वसमाज के रक्षक और सामाजिक सरोकारों के अगुआ
संजय मिश्रा जी का सामाजिक दायरा अत्यंत व्यापक और सर्वस्पर्शी है। वे जहां हनुमान सेना ट्रस्ट और श्री महाकाल सेवा समिति के संरक्षक के रूप में धर्म की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं वहीं रोटरी क्लब नॉर्थ ईस्ट के अध्यक्ष तथा रोटरी असिस्टेंट गवर्नर के रूप में समाज के वंचित वर्ग की सेवा में अग्रणी रहते हैं। वर्ष 2017 में आवास विकास के ऐतिहासिक जनकपुरी महोत्सव समिति के महामंत्री के रूप में उनके द्वारा किया गया कुशल प्रबंधन आज भी आगरा के इतिहास में याद किया जाता है। एमएसएमई और इफकोमा के सम्मानित सदस्य के रूप में वे देश की आर्थिक उन्नति में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। शतानंद मिश्रा जी जैसे निष्ठावान और अनुशासित पिता के संस्कारों को आत्मसात करने वाले संजय मिश्रा संगठन को यह पूर्ण विश्वास दिलाते हैं कि यदि उन्हें कोई भी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जाती है तो वे अपनी पूरी निष्ठा लग्न परिश्रम और ईमानदारी से उसका निर्वहन करेंगे।

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